संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शनिवार, 7 नवंबर 2009

ये प्यास पीते,और भूख खाते है


यू ही नहीं किसान पूजे जाते है
ये प्यास पीते,और भूख खाते है

बेबसी के आसू मे आँचल भीगा
उसे हमदर्दी की धूप मे सुखाते है

जिस्म का बोझ नहीं उठता हमसे
और ये खेतो मे गठ्ठर उठाते है

करते है शाद्ध बड़ी श्रद्धा के साथ
मरने के बाद भी रिश्ता निभाते है
 
 
कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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ये पत्थर की दुनिया है .....!!

ये पत्थर की दुनिया है । 
खव्बो को संभाले रखना ।।
 
ले रक्खा है हाथो में नामक ।
अपने घवो को बचाकर रखना।।
 
ठोकर पर सहारा भी तुम को न मिलेगा ।
अगर गिरो तो उठने का होसला रखना ।।
 
रूठ जायगी खुशी एक दिन ।
इस लिये गम को अपना यार बना कर रखना ।।
 
सलामत रहे हर रिश्ता।
दुआ में अपना हाथ उठाये रखना।।
 
उसकी सत्ता का कोई सामी भी नही है ।
बस अपने सर को उसके  सज्दे में झुकाये रखना ।।

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गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मन चंचल गगन पखेरू है,

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,
की किससे चाह है मुझको.
वो बस हालात ऐसे थे,
कि बुरा मैं बन नहीं पाया.
मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,
कोई समझाए तो इसको.
ज़माने की हवा है ये,
ये रूहानी नहीं साया.
मगर ताबीज़ ला दो तुम,
तसल्ली गर मिले तुमको.
उसे लम्हे डराते हैं,
कल की गम की रातों के,
है सूरज हर घड़ी देता,
ख़ुशी की रौशनी जिसको.
  
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

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बुधवार, 23 सितंबर 2009

हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,

 
 
जो छूट गई है दुनिया में,, मेरी ही कुछ हस्ती थी
साहिल छोर के दरिया डूबी , मजबूत बड़ी वो कश्ती थी

उनका घर तो रौशन था पर डर था सबके चेहरे पर
एक उनके घर में रौनक थी और जलती सारी बस्ती थी

कुछ जिन्दा और मुर्दा लड़ते अल्लाह ईश के नाम पर
खामोशी मजबूरी थी कुछ जान यहाँ पर सस्ती थी

तूफानों को रंज बहुत था और चरागाँ जलते थे
कुछ अरमानो की दुनिया थी कुछ मौत यहाँ पर हस्ती थी

दिल लाख छुपाओ ताले में कोई चोर चुरा ले जायेगा
हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,
 
 
''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना
 

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मंगलवार, 15 सितंबर 2009

सो जा ......

सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
तेरी चंदा जैसी माता
तेरे पिता है विधाता
और तू है सब की आँखों का तारा
सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
तेरे नन्ही नन्ही आंखे
इनमें सपने कितने सरे
इन सपनो में कही तू खो जा
सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
ला ला .....हम्म ....ला ला ......ला ला .....हम्म ....ला ला
ला ला .....हम्म ....ला ला .....ला ला .....हम्म ....ला ला

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शनिवार, 12 सितंबर 2009

फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,
तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .
उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,
क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.
तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे,
अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.
माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे.
फिर रोटियों के चोर कितने, भूखे पीटे जायेंगे,
फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना


 

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

शामिल है.

लहू पहाड़ के दिल का, नदी में शामिल है,
तुम्हारा दर्द हमारी ख़ुशी में शामिल है.
तुम अपना दर्द अलग से दिखा न पाओगे,
तेरा जो दर्द है वो मुझी में शामिल है.

गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,
जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.
दूर कितनी भी रहूँ, खोलोगे जब भी आँख तुम,
मैं सिरहाने पर तुम्हारे जागती मिल जाऊँगी.
घर के बाहर जब कदम रखोगे अपना एक भी,
बनके मैं तुमको तुम्हारा रास्ता मिल जाऊँगी.
मुझपे मौसम कोई भी गुज़रे ज़रा भी डर नहीं,
खुश्क टहनी पर भी तुमको मैं हरी मिल जाऊँगी.
तुम ख्यालों में सही आवाज़ देके देखना,
घर के बाहर मैं तुम्हें आती हुई मिल जाऊँगी.
गर तसब्बुर भी मेरे इक शेर का तुमने किया,
सुबह घर कि दीवारों पर तुम्हें लिखी हुई मिल जाऊँगी।

कवि : 'बीती ख़ुशी' जी की रचना

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