संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

तुम्ही विस्तार हो मेरा


और उस जमीं के सर का,

तुम्ही विस्तार हो मेरा.

कैसे?

हाँ कैसे..........हो मेरा.

तुम्हारे ही सपनों के तिनकों से,

मैंने नींव रखी है

अपने घोंसले की,

और तुम्हारी आँखों की चमक से

मिलती है

खुराक हौसले की.

वर्ना ठूँठ पे,

हाँ पुराने ठूँठ पे

नए घोंसले नहीं बनते,

बनकर के होंठ मेरे

तुम्ही तो इज़हार हो मेरा.

कैसे?

हाँ कैसे......हो मेरा.
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

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सोमवार, 26 जुलाई 2010

वो आत्मा का प्रतिविम्ब गहरा है ........!!

मेरी हर बात का ......., उन्हे ख्याल रहता है ........!!
हर आंसू और हसी का......., हिसाब रहता है ........!!
पूजती हुँ मैं उन्हे ......., वो मन मंदिर में रहता है ........!!
मैं चुप से खो गई उनमे......., वो मुझ को ढूँढा करता है ........!!
वो मेरी सांस है ......., मुझी में सांस लेते है ........!!
मैं उनकी ज़िन्दगी ......., वो ज़िन्दगी के साथ रहता है ........!!
ये कैसा दौर है......., कहाँ आ कर ये वक्त ठहरा है ........!!
उन्ही की बात है......., हर बात पर बस उनका पहरा है ........!!
मैं उनकी आत्मा ......., वो आत्मा का प्रतिविम्ब गहरा है ........!!
.......!! .......!! .......!! .......!! .......!! .......!! .......!! .......!! .......!! .......!!

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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

धुँआ-धुँआ सा नज़र आया सब

धुँआ-धुँआ सा नज़र आया सब,
उसने मुझको था ठुकराया जब.
इतना बेबस के जैसे खूँ ही नहीं,
गिरे बदन को जमीं से उठाया जब.
सब अधूरा सा नज़र आया था,
चाँद कोरा सा ख्वाब लाया जब.
रंग फूलों का हो गया काफुर,
कितना फीका सा शफक छाया तब.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना

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मंगलवार, 22 जून 2010

कतरा कतरा

यूँ मेरा जिन्दगी भी जीना कतरा कतरा
यूँ तेरे लिए जहर भी पीना,, कतरा कतरा

चोट खाकर मेरा यूँ खामोश रहना
यूँ मेरा जख्म भी सीना ,,कतरा कतरा

तुमसे मोहब्बत हमें और छुपाना तुमसे
ये माथे पे मेरे पसीना ,,कतरा कतरा

तुम्हे पाने की ख़ुशी और डर मेरा ये
चाँद सा डर ये नगीना ,,कतरा कतरा

खोने की वजह नहीं कोई और वहम ये
आँखों की बारिश का महीना ,,कतरा कतरा

खामोश हूँ इन बातों से क्या
मुझे है यूँ ही जीना ,,कतरा कतरा

कवि : "अजीत त्रिपाठी जी" की रचना

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शनिवार, 5 जून 2010

जारी है एक सफ़र मेरा तीरगी के साथ

जारी है एक सफ़र मेरा तीरगी के साथ
जंग चल रही है मेरी रौशनी के साथ

मुझे मालूम नहीं कि क्या सोच कर
मै खुद भी रो दिया बेबसी के साथ

ताज़ा हुए है जख्म मेरे फिक्र कीजिये
जब से मिला वो मुझे बेरुखी के साथ

पैमाने मै तुझको यू उदास देखकर
मैकदे से घर गया तिशनगी के साथ

होसलो तुम भी मेरे संग- संग चलो
जंग चल रही है मेरी जिंदगी के साथ

कवि : रोहित कुमार "मीत" जी कि रचना

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मंगलवार, 18 मई 2010

दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके...

दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके
देखिये सारे शिकवे-गिले को भुला करके
दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके

वफा के बदले अब नहीं मिलती वफा
हमने तो देखा है ये भी तजुर्बा करके

खुशिया भी मिली तो अजनबी बनके
जब से गया वो गम से आशना करके

ख्यालो कि मंजिल कदम-२ पे टकराएगी
देखो किसी कि यादों को रास्ता करके

मिलेगा सुकून कीजिये बेवफाई का गिला
देखिये "मीत" ये भी कभी होंसला करके

कवि : रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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शुक्रवार, 14 मई 2010

पल दो पल...

पल दो पल... चल साथ चले,
फिर रह जाने... विराने है!!

आज चलो... कुछ ऐसे मिलें,
लोग कहे... दिवाने है!!

तुम संग मिलके... ऐसे जले,
लोग कहे... परवाने है!!

मन में ऐसे... हूक उठे ,
हाथ मिले... छूट जाने है !!

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