संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

तुम्ही विस्तार हो मेरा


और उस जमीं के सर का,

तुम्ही विस्तार हो मेरा.

कैसे?

हाँ कैसे..........हो मेरा.

तुम्हारे ही सपनों के तिनकों से,

मैंने नींव रखी है

अपने घोंसले की,

और तुम्हारी आँखों की चमक से

मिलती है

खुराक हौसले की.

वर्ना ठूँठ पे,

हाँ पुराने ठूँठ पे

नए घोंसले नहीं बनते,

बनकर के होंठ मेरे

तुम्ही तो इज़हार हो मेरा.

कैसे?

हाँ कैसे......हो मेरा.
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

धुँआ-धुँआ सा नज़र आया सब

धुँआ-धुँआ सा नज़र आया सब,
उसने मुझको था ठुकराया जब.
इतना बेबस के जैसे खूँ ही नहीं,
गिरे बदन को जमीं से उठाया जब.
सब अधूरा सा नज़र आया था,
चाँद कोरा सा ख्वाब लाया जब.
रंग फूलों का हो गया काफुर,
कितना फीका सा शफक छाया तब.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना

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गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मन चंचल गगन पखेरू है,

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,
की किससे चाह है मुझको.
वो बस हालात ऐसे थे,
कि बुरा मैं बन नहीं पाया.
मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,
कोई समझाए तो इसको.
ज़माने की हवा है ये,
ये रूहानी नहीं साया.
मगर ताबीज़ ला दो तुम,
तसल्ली गर मिले तुमको.
उसे लम्हे डराते हैं,
कल की गम की रातों के,
है सूरज हर घड़ी देता,
ख़ुशी की रौशनी जिसको.
  
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

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शनिवार, 12 सितंबर 2009

फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,
तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .
उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,
क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.
तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे,
अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.
माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे.
फिर रोटियों के चोर कितने, भूखे पीटे जायेंगे,
फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना


 

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बुधवार, 2 सितंबर 2009

है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.

क्या खूब पायी थी उसने अदा।
ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह॥


कतरे गए कई परिंदों के पर।
सबको खेला था वो बाजियों की तरह॥


हौसला नाम से रब के देता रहा।
फैसला कर गया काजिओं की तरह


ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर।
करके छोडा हमें हाशिओं की तरह


साहिलों को मिलाने की जुंबिश तो थी।
खुद का साहिल था माझिओं की तरह


जिनको दिल से लगा 'मशाल' शायर बना।
है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह॥



कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना

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मंगलवार, 1 सितंबर 2009

पूछता रहता है क्या

ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,
ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.
जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश करना क्या,
इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.
खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,
गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है क्या.
कोई मंतर नहीं ऐसा, जो आदमियत जिला सके,
कान में इस मुर्दे के, तू फूंकता रहता है क्या.
आएँगी कहाँ वो खुशबुएँ, अब इनमें 'मशाल',
दरारों में दरके रिश्तों की, सूंघता रहता है क्या.

कवि : दीपक 'मशाल' जी की रचना

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बुधवार, 26 अगस्त 2009

सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए.....


कभी मैं चल नहीं पाया, कभी वो रुक नहीं पाए।
मेरे जो हमसफ़र थे, साथ वो रह नहीं पाए।।

मेरे घर में नहीं आई, कितने सालों से दीवाली।
तू आ जाये तो आँगन में, अँधेरा रह नहीं पाए।।

लगाते हैं सभी तोहमत, मैं तुझसे हार जाता हूँ।
मेरी हस्ती ही ऐसी है, कि कोई टिक नहीं पाए।।

मैं माँझी हूँ मगर खुद न, कभी उस पार जा पाया।
मेरे अरमाँ ही लहरों पे, कभी भी बह नहीं पाए।।

कमर टूटी नहीं मेरी, किसी की जी-हुजूरी से।
बोझ बढ़ता गया हर पल, पर काँधे झुक नहीं पाए।।

ना फ़रेब कह देना, सिला-ए-चाहत कों 'मशाल'।
सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए।।

कवि : दीपक 'मशाल' जी की रचना

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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ....

कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।
मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥

तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।

नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये।
जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ।।

मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू।
मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ।।

कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से।
कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ।।

कवि : दीपक चौरसिया जी की रचना

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