संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

बुधवार, 2 सितंबर 2009

है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.

क्या खूब पायी थी उसने अदा।
ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह॥


कतरे गए कई परिंदों के पर।
सबको खेला था वो बाजियों की तरह॥


हौसला नाम से रब के देता रहा।
फैसला कर गया काजिओं की तरह


ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर।
करके छोडा हमें हाशिओं की तरह


साहिलों को मिलाने की जुंबिश तो थी।
खुद का साहिल था माझिओं की तरह


जिनको दिल से लगा 'मशाल' शायर बना।
है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह॥



कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना

7 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 2 सितंबर 2009 को 1:26 pm  

दीपक 'मशाल' जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

फ़िरदौस ख़ान 2 सितंबर 2009 को 1:43 pm  

बहुत सुन्दर रचना है...

Nirmla Kapila 2 सितंबर 2009 को 4:39 pm  

लाजवाब रचना है दीपक जी को बहुत बहुत बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 2 सितंबर 2009 को 9:36 pm  

जिनको दिल से लगा 'मशाल' शायर बना।
है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह॥
बहुत बढ़िया,
आपका आभार!

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 2 सितंबर 2009 को 11:32 pm  

Bahut Sunder DEEPAK. Ab tum bahut jagah padhne ko mil rahe ho. BADHAAII.
Lage raho isii tarah.

दीपक 'मशाल',  3 सितंबर 2009 को 1:16 am  

बस आपका आशीर्वाद और स्नेह चाहिए. मैं तो सिर्फ इस दुनिया और आप लोगों से सीखे हुए को अपनी तरफ से अच्छे से अच्छे तरीके से पेश करने की एक कोशिश भर करता हूँ.
अभिवादन

विनय ‘नज़र’ 5 सितंबर 2009 को 2:34 am  

बधाई, रचना सुन्दर बन पड़ी है

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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