संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

सोमवार, 7 सितंबर 2009

मेरी बेबसी देखिये

बना डाला खुदा उफ़ ये बंदगी देखिये
अकीदते-बाज़ार मे खडा आदमी देखिये

समंदर भी लगने लगा है दरिया मुझे
भड़की है एक कदर तिशनगी देखिये

हर बार आईने मे शक्ल नयी सी दिखे
कितने हिस्से मे बट गयी जिंदगी देखिये

रो देते है तन्हाई मे खुद से बाते कर"मीत"
गर मिले फ़ुर्सत तो मेरी बेबसी देखिये

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

11 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 7 सितंबर 2009 को 12:27 pm  

रोहित कुमार "मीत" जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

Nirmla Kapila 7 सितंबर 2009 को 12:55 pm  

laajavaab abhivyakti hai
हर बार आईने मे शक्ल नयी सी दिखे
कितने हिस्से मे बट गयी जिंदगी देखिये
bahut khoob Rohit jee ko bahut bahut badhai

मोहन वशिष्‍ठ 9988097449 7 सितंबर 2009 को 3:02 pm  

बहुत ही अच्‍छी पोस्‍ट बहुत सुंदर रचना

ओम आर्य 7 सितंबर 2009 को 3:42 pm  

रो देते है तन्हाई मे खुद से बाते कर"मीत"
गर मिले फ़ुर्सत तो मेरी बेबसी देखिये
क्या कहे ......उफ्फ यह गम किसी को नसीब ना होवे .......अल्लाह इस गम से आपको बाहर निकाले....

ओम आर्य 7 सितंबर 2009 को 3:42 pm  

रो देते है तन्हाई मे खुद से बाते कर"मीत"
गर मिले फ़ुर्सत तो मेरी बेबसी देखिये
क्या कहे ......उफ्फ यह गम किसी को नसीब ना होवे .......अल्लाह इस गम से आपको बाहर निकाले....

विनय ‘नज़र’ 7 सितंबर 2009 को 4:40 pm  

बहुत बढ़िया रचना है
---
BlueBird

आनन्द वर्धन ओझा 7 सितंबर 2009 को 4:53 pm  

गार्गी जी,
'मीत' जी की ग़ज़ल ज़िन्दगी का फलसफा है.... उदास दिल का फरमान है और आज की कड़वाहटों के खिलाफ गहरी शिकायत का दस्तावेज़ गई ! प्रभावी ग़ज़ल ! बधाई !!

alfaz 8 सितंबर 2009 को 9:22 am  

Sundar, dil ko cho jane wali panktiyan ... bahut khub.

Scorpion King 22 सितंबर 2009 को 5:37 am  

हर बार आईने मे शक्ल नयी सी दिखे
कितने हिस्से मे बट गयी जिंदगी देखिये

Kuchh zindagi ajib thi, kuchh hum ajib the, jo khuli aankhon me baste the unhein band aankhon se hi dhoondate rahe, aur voh na jaane kab aakar chupke se chale gaye aur hum khwahishon ke jahan me phir tanha,
"Aibon ko Chhipa lena insaan ki fitrat hai, aaiine haqeeqat se inkar nahin karte" Ye jo chehre darpan mein badle hain vo teri hi zindagi ke saaye hain to kab talak bhagoge apne hone se."

U have written too good lines for ur life.

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