आज फिर अन्तर्मन हुआ उद्धेलित
आज फिर मन हुआ उद्धेलित
मन सशंकित, क्या पाउँगा
निरा लड़कपन, दौड़ जवानी,
सुस्ताया बुढापा, ख़तम कहानी
ये कौन है
जो दॉव नित नई चल रहा है
परदे के पीछे से
नित नई तानाँ- बानाँ बुन रहा है
कह गए वो सारथि बन कर बहुत कुछ,
बो बहुत कुछ क्यों फिसलता जा रहा है
क्यों सशंकित मन हुआ है,
क्या कोई फिर से दावँ नई चल रहा है
धार में - मजधार में हूँ ,
हूँ किनारे से अपरिचित
है भरोशा बो बहुत कुछ,
सारथी बन देगा किनारा
फिर भी न जाने,
क्यों सशंकित मन हुआ है,
बावला बन, क्यों भटकता फिर रहा है
भर्मित क्यों हो रहा उससे,
जिसका होना ही भ्रम है
कह गए शंकर की, अद्वेत है सब,
रूप - रेखा सब यहाँ बस एक भ्रम है
पेट भी और भूख भी क्या एक भ्रम है ?
शाश्वत तो यहाँ केवल एक ब्रहम है ....
सुन कर ही इसे मै पान कर लूं ,
या फिर चिंतन - मनन और ध्यान कर लूं
है अबूझ ये बुझ न पाऊँ,
इसलिए ये मन सशंकित हुआ है
फिर कभी उलझुंगा इससे,
फिर कभी निपटूंगा इससे
कवि: कुंवरजी की रचना








