संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 30 जून 2009

आज फिर अन्तर्मन हुआ उद्धेलित

आज फिर मन हुआ उद्धेलित
मन सशंकित, क्या पाउँगा

निरा लड़कपन, दौड़ जवानी,
सुस्ताया बुढापा, ख़तम कहानी

ये कौन है
जो दॉव नित नई चल रहा है

परदे के पीछे से
नित नई तानाँ- बानाँ बुन रहा है

कह गए वो सारथि बन कर बहुत कुछ,
बो बहुत कुछ क्यों फिसलता जा रहा है

क्यों सशंकित मन हुआ है,
क्या कोई फिर से दावँ नई चल रहा है

धार में - मजधार में हूँ ,
हूँ किनारे से अपरिचित

है भरोशा बो बहुत कुछ,
सारथी बन देगा किनारा

फिर भी न जाने,
क्यों सशंकित मन हुआ है,
बावला बन, क्यों भटकता फिर रहा है

भर्मित क्यों हो रहा उससे,
जिसका होना ही भ्रम है

कह गए शंकर की, अद्वेत है सब,
रूप - रेखा सब यहाँ बस एक भ्रम है

पेट भी और भूख भी क्या एक भ्रम है ?
शाश्वत तो यहाँ केवल एक ब्रहम है ....

सुन कर ही इसे मै पान कर लूं ,
या फिर चिंतन - मनन और ध्यान कर लूं

है अबूझ ये बुझ न पाऊँ,
इसलिए ये मन सशंकित हुआ है

फिर कभी उलझुंगा इससे,
फिर कभी निपटूंगा इससे


कवि: कुंवरजी की रचना

18 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 30 जून 2009 को 1:18 pm  

कुंवरजी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुघंद बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

रंजना 30 जून 2009 को 2:16 pm  

Gahan sundar chintan...Sundar rachna....

परमजीत बाली 30 जून 2009 को 2:18 pm  

सुन्दर रचना प्रेषित की हैं बधाई।

विनोद कुमार पांडेय 30 जून 2009 को 2:23 pm  

उद्धेलित मन की भाषा,
विचारों की गहन परिभाषा,
बहुत ही सशक्त है,
आपकी रचना पर मेरा मन आशक्त है.

ओम आर्य 30 जून 2009 को 2:35 pm  

बहुत ही सुन्दर रचना ............बहुत खुब

sada 30 जून 2009 को 3:29 pm  

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

alfaz 30 जून 2009 को 5:17 pm  

पेट भी और भूख भी क्या एक भ्रम है ?
शाश्वत तो यहाँ केवल एक ब्रहम है ....
bahut hi umda line likhe hai apne,
sara jeevan ek brahm sa hi lagta hai,maut ke waqt yeh brahm toot jata hai....bahut khub.

Udan Tashtari 30 जून 2009 को 11:47 pm  

कुंवर जी की इस उम्दा रचना को प्रस्तुत करने का आभार.

Einstein 1 जुलाई 2009 को 12:27 am  

मै तो बस मन में चल रही रस्सा -कशी को लिख डालता हूँ |
यदि ये उम्दा, बेहतरीन और सुन्दर बन पड़ी है तो गुनाहगार मेरा मन ही है, उम्मीद है ये फिर गुनाह करेगा |
इसमें कोई भर्म न हो, कुंवर मै ही हूँ|
अपनी गुनाह कबुल करता हूँ|

प्रदीप मानोरिया 1 जुलाई 2009 को 12:46 pm  

आपका बहुत सुन्दर रचना अत्यंत भावः पूर्ण

प्रदीप मनोरिया
09425132060

मीत 2 जुलाई 2009 को 1:01 pm  

फिर कभी उलझुंगा इससे,
फिर कभी निपटूंगा इससे
sunder...
badhai sweekar karen..

महामंत्री - तस्लीम 2 जुलाई 2009 को 6:20 pm  

आपका उद्वेवल मन को झकझोर गया भीतर तक।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

sandhyagupta 3 जुलाई 2009 को 1:12 pm  

Is arthpurn rachna ko prastut karne ke liye dhanywaad.

ajitji 4 जुलाई 2009 को 8:12 pm  

man ka gahan chintan ,,
sundar rachana par badhaai kuvar ji

Shama 5 जुलाई 2009 को 2:35 pm  

Shabdon ke pare jaake ye ehsaas thame hain...yaa beh rahe hain!!Aur kya kahun?

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