संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शनिवार, 30 मई 2009

आई लव यू दद्दू .....!! सेम टू यू बुद्दू.....!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
अरे सुनो ना दद्दू.....!!
अबे....बोल बे बुद्धू....!!
एक सरकार बनाओ ना.....!!
बात क्या है,बताओ ना....!!
हमको समर्थन देना है...!!
मगर हमको नहीं लेना है....!!
ले लो ना समर्थन हमसे.....!!
अरे नहीं लेना समर्थन तुमसे....!!
लेकिन हम तो दे के रहेंगे.....!!
लेकिन हम तुमको कोई पद नहीं देंगे....!!
पद की किसको पड़ी है दद्दू...!!
तो समर्थन किस बात का बुद्दू...??
हम सांप्रदायिक सरकार नहीं चाहते
और हम धर्म-निरक्षेप सांप्रदायिक कहलाते हैं....!!
तो क्या हुआ धर्म-निरक्षेप तो हैं ना...!!
लेकिन हम तो इसका अर्थ भी नहीं जानते....!!
तो क्या हुआ धर्म-निर तो हैं ना...!!
लेकिन हमने इसके लिए कभी कुछ किया ही नहीं.....!!
तो क्या हुआ धर्म-निरक्षेप तो हैं ना...
लेकिन इस धर्म-निरक्षेपता का कोई मतलब भी तो हो.....!!
अरे आपकी मैडम है ना...
इतना ही बहुत है.....!!
लेकिन हमारी मैडम तो सरकार चलाती नहीं....??
तो क्या हुआ वो आपको उँगलियों पर तो नचाती है.....!!
इस नाचने में दर्द बहुत गहरा है बुद्दू.....!!
और सरकार चलाने का सुख भी तो गहरा है ना दद्दू ....!!
लेकिन हमें तुझसे समर्थन नहीं लेना है भाई
हम तुम्हारे ही साथ हैं भाई.....!!
तुम और हमारे साथ...??....अबे कैसा साथ...??
तू तो सदा हमसे लड़ता ही रहा है....!!
बाहर भी दुश्मनों का साथ ही दिया है....!!
आपको ग़लत फहमी है दद्दू.....!!
वो तो राजनीति की बिसात थी......!!
तो अब और क्या है भाई ...??
अब तो आप ही हमारे बाप हो......!!
और मैडम ही है हमारी माई.....!!
अबे तू आदमी है कि गिरगिट....??
तूने राजनीति को बना दिया है किरकिट....!!
अरे दद्दू, हम ना आदमी हैं ना गिरगिट.....!!
असल में राजनीति ही है हमारी सर्विस.....!!
अपनी रऔ में जब हम आ जाते हैं...!!
देश को भी पका कर खा जाते हैं....!!
तुम भी तो दद्दू हमारी ही जात के हो.....!!
आज थोड़ा दम हो गया hai तो.....
हमही से दायें-बाएँ होने लगे......!!
दद्दू......कुछ आगे का भी देख लो...
अपना भला-बुरा का भी सोच लो.....!!
कुछ महीनों में ही तेरे परिवार के लोग.....
तेरी नैया डूबोने लगेंगे....!!
और तब तू और तेरी मैडम.....
हमें खोजने निकल पड़ेंगे......!!
अरे हाँ मेरे बच्चे......कहता तो तू ठीक है!!!
अरे बुद्दू ,मैं तो तुझसे मज़ाक कर रहा था.....!!
कोई सीरिअस थोड़ा ना कह रहा था....!!
आ जा मेरे बच्चे,मेरे गले लग जा.....!!
मेरी गोद में आकर बैठ जा.....!!
अरे वाह मेरे दद्दू.....!!
तुम तो काफी समझदार हो गए हो.....!!
अरे पुत्तर.......!! साठ सालों की उम्र का है यह असर.....!!
इसी समझदारी से तो हमने तय किया है....
राजनीति का यह दुश्वार सफर.....!!
दद्दू ....!!मेरे प्यारे दद्दू....!!
पुत्तर....!!मेरे प्यारे पुत्तर........!!
आई लव यू दद्दू .....!!सेम टू यू बुद्दू.....!!

कवि : राजीव जी की रचना

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शुक्रवार, 29 मई 2009

रास्ता होता है....बस नज़र नहीं आता..........!!


कभी-कभी ऐसा भी होता है
हमारे सामने रास्ता ही नहीं होता.....!!
और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम....
खीजते हैं,परेशान होते हैं...
चारों तरफ़ अपनी अक्ल दौडाते हैं
मगर रास्ता है कि नहीं ही मिलता....
अपने अनुभव के घोडे को हम....
चारों दिशाओं में दौडाते हैं......
कितनी ही तेज़ रफ़्तार से ये घोडे
हम तक लौट-लौट आते हैं वापस
बिना कोई मंजिल पाये हुए.....!!
रास्ता है कि नहीं मिलता......!!
हमारी सोच ही कहीं गूम हो जाती है......
रास्तों के बेनाम चौराहों में.....
ऐसे चौराहों पर अक्सर रास्ते भी
अनगिनत हो जाया करते हैं..........
और जिंदगी एक अंतहीन इम्तेहान.....!!!
अगर इसे एक कविता ना समझो
तो एक बात बताऊँ दोस्त.....??
रास्ता तो हर जगह ही होता है.....
अपनी सही जगह पर ही होता है.....
बस.....हमें नज़र ही नहीं आता......!!!! 

कवि : राजीव जी की रचना

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बुधवार, 27 मई 2009

तुम्हारी आंखें!

तुम्हारी आंखें!
कभी मेरे चेहरे के आस-पास
सरगोशियाँ करती हैं...
कभी आधी रात को ख्वाबों में
मेरी अंखियों से अठखेलियाँ करती हैं...
तुम्हारी आंखें!
गिरती है जब बारिश कभी मेरे तन पर
इन्हीं से निकली आंसुओं की बूंद सी लगती है...
सूख जाती है बारिश तो बरसने के बाद,
पर तुम्हारी आँखों में क्यों मुझे नमी सी लगती है...
तुम्हारी आंखें!
कुछ तो कहानी है इनमें,
जो मेरे कानो पे ये सुबकती हैं...
बोलती तो कुछ नहीं हैं पर,
एकटक मुझी को तकती हैं...
क्या करूँ में इनका, मेरी ज़िंदगी सालों से सोयी नहीं है?
तुम्हारी पथराई आँखों को देख मेरी आंख भी कब से रोई नहीं है...
वापस आ जाओ तुम कहाँ चली गई हो?
साथ अपने मेरी हँसी ले गई हो...
अपने होंठों के तले तुम्हारी आँखों को,
ढेर सा आराम दूंगा...
तुम्हारी आँखों में देखकर,
बाकि ज़िंदगी भी गुजार दूंगा...
तडपता है दिल जब ये,
मेरा पीछा करती हैं...
मुड़कर देखता हूँ तो,
छलका करती हैं...
अब सहन नहीं होता,
मुझे अपनी आँखों से मिला दो...
जहाँ तुम छुप गई हो...
मुझे भी छुपा दो....

कवि : मीत जी की रचना

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मंगलवार, 26 मई 2009

हम तो बस करतब दिखा रहे हैं......!!


चार बांसों के ऊपर झूलती रस्सी.....
रस्सी पर चलता नट
....
अभी गिरा,अभी गिरा,अभी गिरा

मगर नट तो नट है ना

चलता जाता है
....
बिना गिरे ही

इस छोर से उस छोर

पहुँच ही जाता है
.....!!
इस क्षण आशा और

अगले ही पल इक सपना ध्वस्त
....!!
अभी-अभी
.....
इक क्षण भर की कोई उमंग

और अगले ही पल से

कोई अपार दुःख

अनन्त काल तक

अभी-अभी हम अच्छा-खासा

बोल बतिया रहे थे और

अभी अभी टांग ही टूट गई
....!!
कभी बाल-बच्चों के बीच
....
कभी सास बहु के बीच
.....
कभी आदमी औरत के के बीच

कभी मान-मनुहार के बीच

कभी रार-तकरार के बीच
....
कभी अच्छाई-बुराई के बीच

कभी प्रशंसा-निंदा के बीच

कभी बाप-बेटे के बीच

कभी भाई-भाई के बीच

कभी बॉस और कामगार के बीच

कभी कलह और खुशियों के बीच

कभी सुख और के बीच
....
जैसे एक अंतहीन रस्सी

इस छोर से उस छोर तक

बिना किसी डंडे के ही

टंगी हुई है ,और हम

एक नट की भांति

करतब दिखाते हुए

बल खाते हुए

गिरने-संभलने के बीच

चले जा रहे हैं
.....
बिना यह जाने हुए कि
....
दूसरा जो छोर है
....
उस पर तो मौत खड़ी हुई है
....
हम संभल भी गए तो

कोई अवसर नहीं है
....
कुछ भी पा लेने का.....!!!!

कवि : राजीव जी की रचना

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शुक्रवार, 22 मई 2009

अपनी अमीरी पर इतना ना इतराओ लोगों......!!


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
तूम अमीर हो,यह बात
कुछ विशेष अवश्य हो सकती है
मगर,वह गरीब है....
इसमें उसका क्या कसूर है.....??
अभी-अभी जो जन्म ले रहा है
किसी भीखमंगे के घर में जो शिशु
उसने कौन सा पाप किया है
ज़रा यह तो सोच कर बताओ......!!
वो लाखों-लाख शिशु,जो इसी तरह
ऐसी माँओं की कोख में पल रहें हैं......
वो-कौन सा कर्मज-फल भुगत रहे हैं.....??
अभी-अभी जो ओला-वृष्टि हुई है चारों तरफ़
और नष्ट हो गई है ना जाने कितनी फसल
ना जाने कितने किसानो की.....
ये अपने किस कर्म का फल भुगत रहे हैं....??
एक छोटी-सी लड़की को देखा अभी-अभी
सर पर किसी चीज़ का गट्ठर लिए
चली जा रही थी ख़ुद के वज़न से भारी...
समझ नहीं पाया मैं कि उसकी आंखों में
दुनिया के लिए क्या बचा हुआ है.....!!
इस तूफ़ान और बारिश में ना जाने
कितने ही घरों के घास-फूस और खपरैल के
छप्पर कहाँ जाकर गिरें हैं.....
और हमारे बच्चे पानी में नाव तैरा रहे हैं....
हम खुश हो रहें हैं अपने बच्चों की खुशियों में....!!
सच क्या है और कितना गहरा है.....
यह शायद भरे पेट वाले ही खोज सकते हैं.....
और जिस दिन पेट खाली हो.....
अन्न भी ढूढने लगेंगे यही सत्यान्वेषक लोग
कोई अमीर है,यह बेशक
उश्के लिए खुशी की बात हो सकती है.....
मगर इस बात के लिए वह तनिक भी ना इतराए....
क्योंकि कोई गरीब है,इस बात में हर बार
उस गरीब कोई दोष नहीं है.....
अपनी डफली बजाना अच्छी बात हो सकती है
लेकिन दूसरे की फटी हुई डफली को
मिल-मिला कर बना देना,यही समाज है
जो हाड-तोड़ मेहनत कर रहे रात और दिन
शायद पूरे परिवार की रोटी तक नहीं जुटा पा रहे....
और खेलने-खाने वाले लोग इक क्षण में
जीवन-भर का समान जुटा ले रहे हैं....
यह जो मज़े-मज़े का सिस्टम है.....
इस पर विचार किए जाने की जरुरत है....!!
कि किस बात का क्या सिला होना चाहिए....
किस काम के लिए किसको क्या मिलना चाहिए....!!
कर्मठता को क्या इनाम मिले.....
और बेईमानी को कहाँ होना चाहिए.......!!
वगरना बेशक तूम बात करो बेशक महानता भरी
लेकिन गरीब,गरीब ही रह जाने वाला है....
क्योंकि तुम्हारे सिस्टम से बेखबर वह....
सिर्फ़ अपने काम में तल्लीन रहने वाला है....
और वाक्-पटु...चतुर सुजान उसका हिस्सा भी
उसीके नाम पर ख़ुद हड़प कर जाने वाला है....!!
सत्ता किसी के भी हाथ में हो.....
गरीब के हाथ में कुछ भी नहीं आने वाला है.....!!
जो भी दोस्तों,तुम बेशक अमीर हो
किंतु कम-से-कम इतना तो करो....
हर इंसान को चाहे
 
कवि : राजीव जी की रचना

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इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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