संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

सोमवार, 4 मई 2009

ऐसा क्यो होता है ???

दिल ....और दिमाग करते है मशक़्क़त !!
कौन है ऐसा जो देगा इसका उत्तर??
मुझ से पूँछा तू बता क्या है बहतर!! प्यार की गाली या दोस्ती की शिद्दत सवाल गंभीर था .........!! डूब गई सोच में!! फिर बोली ...................ये दोनो है ज़िन्दगी की जरूरत एक उम्र भर का साथ है और दूसरा खूबसूरत रिश्ता ....!! दोस्ती है कच्ची मिट्टी ......टूट -टूट कर बिखर बिखर कर .... नये - नये रूप रखती है .....प्यार उस मिट्टी का पक्का रूप है!! जिसमें खुशियाँ तो है ..... पर गम की भी कडी धूप है ...!!!!! जरा ढेस लगे तो दरार बने ..... फिर ज़िन्दगी किसी काम का नही रहती। पल भर में ......पंगु कर देती है !! .....पर दोनो में मिट्टी ही होती है !! विश्वास और भरोसे की जो दोस्ती के कच्चे घड़े को पक्के प्यार के कलश में बदलती है । खुशी के सागर और गम की रात देती है.... हर पल रंग बदलती है !! क्या है ......ये ?? पता नही !! पल पल रंग बदलती .................है एक अलग सी दुनिया है ये..... जहाँ बस प्रीतम के ख्याल ही मन में रहते है! ..... बस! वो ही सपनो में और वो ही धड़कन में......!!! दोस्ती भी फीकी लगती है !! सब की ज़िन्दगी बदलती है ये प्यार की गाली!! पर ......ये भी तो दोस्ती की इबादत पर बनी होती है ! ये दो आत्माओं की पूजा है ......! भावो की अभिव्यक्ति है .....! जिसने बस समर्पण ही सीखा है ....! दोस्ती ने ही खुद को मिटा कर ......... प्रेम के ये रथ सीचा है ......! दोस्ती ही पूजा है । इस जैसा न कोई दूजा है । पर जब सब से अच्छा दोस्त प्रेम बनता ........तो बात ही अलग होती है । और जब वही प्रेम ........ उस दोस्ती के मिट्टी के कलश को तोड़ देता है!!! तो कुछ बाँकी नही रह जाता ...... बस एक शरीर रह जाता है...... जिसमें ज़िन्दगी नही होती
वो सांस तो लेता है....... पर जीने का इच्छा नही होती
उसका दिल तो धडकता है ........ पर खुशी नही होती
वो काम तो करता है ........पर गति नही होती
एक पुतला बन कर रह जाता है ......मन , आत्मा , शरीर , जज़्बात सभी कुछ तो रुक जाता है ! क्योकि यकीन ही नही हो पता कि जिस पर हम इतना यकीन कर चले थे !!!! वो नही है हमारे पास .......... चला गया है छोड कर बीच रास्ते में! और पता नही ये सांस क्यों चल रही है??? बार बार खुद पर ही गुस्सा आता है ...... कि क्यों नही पहचान सके ....... उस प्यारे से चहरे के पीछे छुपे उस हैबन को!!! क्यों उस पर इतना भरोसा किया कि खुद से ही भरोसा उठ गया
क्यों ????

12 टिप्पणियाँ:

मीत 4 मई 2009 को 3:00 pm  

बहुत अच्छा और संजीदा लिखा है... सच्चा-सच्चा सा...
जारी रखें...
मीत

भूतनाथ 5 मई 2009 को 9:02 am  

ऐसा होने दो ना.........क्या हर्ज़ है.....??.........हर्ज़ तो इसे रोक देने में है......जिन्दगी के बड़े गहरे आयाम हैं.....पता नहीं चलता....और किस घडी आकर ये हमें अदम्य उंचाईयां....और अथाह गहराईयाँ प्रदान कर जाते हैं......इसलिए ओ गार्गी.....ऐसा होने दो ना.........क्या हर्ज़ है.....??.........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 5 मई 2009 को 9:22 am  

आशा और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में।
खुशियों वाले सुमन खिलेंगे, घर, आंगन उपवन में।।

G M Rajesh 5 मई 2009 को 10:41 am  

जहाँ बस प्रीतम के ख्याल ही मन में रहते है! ..... बस! वो ही सपनो में और वो ही धड़कन में......!!!

hasraten aur chaahat lagaataar jiti hain aur yah jeet nahi
isliye aisa hota hai......

हिमांशु । Himanshu 5 मई 2009 को 12:19 pm  

संवेदनापूर्ण रचना । आभार ।

Babli 5 मई 2009 को 1:44 pm  

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ की आपको मेरी शायरी पसंद आई!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! आपने बहुत ही सुंदर लिखा है!

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) 5 मई 2009 को 5:19 pm  

सुंदर लिखा है!
जारी रखें...
आभार ।

Pratik Ghosh 5 मई 2009 को 9:23 pm  

आपका लेख प्रशंशा योग्य है!
अच्चा.. क्या आप मुझे ये बता सकते हैं कि मै अपने द्वारा बनाये गए animation और videos किस प्रकार से चिठ्ठाजगत के माध्यम से लोगो तक पंहुचा सकता हूँ?

yuva 8 मई 2009 को 7:42 pm  

achcha hai. Par bhav pravah men itani rukavat kyon hai? Kahin yeh kuch na kah paane ki hichkichahat to nahin hai?

अनिल कान्त : 16 मई 2009 को 12:49 pm  

man ke bhavon ko bakhoobi utara hai ...achchha likha hai

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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