संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

पल पल बदल रही हूँ

पल पल बदल रही हूँ....
तेरे साथ में ....!!
खुद से ही मिल रही हूँ ....
तेरे इंतज़ार में ....!!
जाने क्या अदा है ....
तेरे दुलार में ....!!
परियो सी कहानी है ....
ज़िन्दगी तेरे साथ में ....!!
खुशबू सी घुल रही है ....
हर एक रह में ....!!
जोगन सी बन गई हूँ ....
तेरे याद में ....!!
हर काम चल रहा है ....
तेरे ध्यान में ....!!
चल रही है सांस ....
तेरे इंतज़ार में ....!!

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शुक्रवार, 5 मार्च 2010

हम ही पागल हो गये.....

हम ही पागल हो गये ,
परछाइयो के पीछे,
खुशिया आ कर वह गई ,
हम रहे आँख मीचे - मीचे
ज़िन्दगी चलती रही,
एक पल भी न रूकी
हम राह तेरी तकते रहे
आंख भी पत्थरा गई
ज़िन्दगी चलती रही
हम होसला रखते रहे
पल पल युही जलते रहे
चाँदनी के नीचे
भीग लेते हम बहुत
बारिशे बरसी नही
आंख ही भिगोती रही
बिस्तरे का कोना
आस की पलकों से ऐसे
विश्वास तप से गिर गया
कांच का सपना था मेरा
खन से टूटा और बिखर गया
पर आंख में चुभता रहा
हम ही पागल हो गये......

हम ही पागल हो गये......

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गुरुवार, 4 मार्च 2010

तेरे काँधे पर हम हो....

गुलिस्ता बने हम
हर तरफ फैली हो महक तेरी
जब तेरे काँधे पर सर हो....

जिन्दगी लगती है
मिश्रि की डली
जब तेरे काँधे पर सर हो....

सोचती हुँ मैं बस
यही गुम सुम
कि तेरे काँधे पर सर हो....

बन जाती हुँ सब से संपन्न
सुखी सारे जहाँ में
जब तेरे काँधे पर सर हो....

ये कोई सपना है
जगाना न हमें
जब तेरे काँधे पर सर हो....

सोये से मन में तमन्ना जागी है
जब चले दुनिया से
तो तेरे काँधे पर हम हो....

चलू मैं तुझ को सराहती
सिसकती रहे पीछे दुनिया सारी
और मुस्कराते तेरे काँधे पर हम हो....

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मंगलवार, 2 मार्च 2010

आप

मन दर्पण है घर अगन
मन का सच्चा प्रतीविम्ब हो आप

सपना देखू हर पल में तो
उन सपनो का साथ हो आप

मन में अति भावनाओ है
उन भावो का सर हो आप

जिसे छुपाये फिरती सब से
ऐसा हसी राज़ हो आप

भाव विचरते है इस मन में
उनकी की अभिव्यक्ति हो आप

पल्को में तस्वीर सजी है
अपलक निहारू, ऐसी मूरत हो आप

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