संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शनिवार, 29 अगस्त 2009

ये किसानो की है हकीक़त क्या बात

आदमी मे आदमीयत क्या बात है
हर-एक की नेक नीयत क्या बात है

साकी ने शराब मे क्या शै मिला दी
वाएज़ को भी दी नसीहत क्या बात है

बदमिजाज़ हुवा शहर नए दौर के नाम पे
संस्कृति की ये फजीहत क्या बात है

माँ-बाप भगवान सामान यहाँ और
पत्थरों मे भी अकीदत क्या बात है

भूख खाते है और प्यास पीते है"मीत"
ये किसानो की है हकीक़त क्या बात है

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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गुरुवार, 27 अगस्त 2009

फिर नाम कैसे ले

रिश्ता कातिल से रहनुमा का।
जैसे आजाब दोस्त की दुवा का॥

उम्र भर अब दर्दे-जुदाई सहना है।
मिला है ये शिला मुझे वफ़ा का॥

इंसानियत से देखो तुम इन्सा को।
मिल जायेगा रास्ता तुम्हे खुदा का॥

बच्चो मे तलाश कर उसे पा भी लो ।
देरो-हरम से नहीं वास्ता देवता का ॥

ख्यालो को ख्यालो मे नहीं आने देते।
फिर नाम कैसे ले"मीत" उस बेवफा का॥

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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बुधवार, 26 अगस्त 2009

सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए.....


कभी मैं चल नहीं पाया, कभी वो रुक नहीं पाए।
मेरे जो हमसफ़र थे, साथ वो रह नहीं पाए।।

मेरे घर में नहीं आई, कितने सालों से दीवाली।
तू आ जाये तो आँगन में, अँधेरा रह नहीं पाए।।

लगाते हैं सभी तोहमत, मैं तुझसे हार जाता हूँ।
मेरी हस्ती ही ऐसी है, कि कोई टिक नहीं पाए।।

मैं माँझी हूँ मगर खुद न, कभी उस पार जा पाया।
मेरे अरमाँ ही लहरों पे, कभी भी बह नहीं पाए।।

कमर टूटी नहीं मेरी, किसी की जी-हुजूरी से।
बोझ बढ़ता गया हर पल, पर काँधे झुक नहीं पाए।।

ना फ़रेब कह देना, सिला-ए-चाहत कों 'मशाल'।
सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए।।

कवि : दीपक 'मशाल' जी की रचना

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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है

क्या बताये हम कि क्या हुवा है
सुलगता हुवा दिल का आशिया है
 
कही दम घुट ना जाए सीने मे
हर एक सिम्त धुवा ही धुवा है
 
वादों -कसमो कि लाज रखनी है
हम कैसे कह दे कि तू बेवफा है
 
मुझको ना यादो पे यकी है अब
ख्यालो से तो अपना सिलसिला है
 
मेरे दिल मे तेरी चाहत है अब भी
मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है
 
कवि: रोहित कुमार "मीत"  जी की रचना

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रुलाकर मुझको वो भी तो रोया होगा

रुलाकर मुझको वो भी तो रोया होगा

जगाकर मुझको वो भी न सोया होगा


चलो उसे हमदर्दी की धूप मे सुखा ले

जो तकिया उसने आसुवों से भिगोया होगा
 
कवि: रोहित कुमार "मीत"  जी की रचना
 

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सोमवार, 24 अगस्त 2009

मैंने वो सपना सहेज रखा है...

उनींदी स्याह रातों में...
रिश्तों की उलझी डोर से,
जिसे तुमने बुना था,
वो सपना...
मैंने सहेज रखा है...
हाँ वही सपना...!!
जो तुम्हें जान से प्यारा था..
वही सपना...
जो तुम्हारे मन का सहारा था...
पलकों की चादर फैंक,
आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...
जब रोकता हूँ इसको
तो घंटो छटपटाता है...
ना जाने देना इसको
तुमने ही तो कहा था,
पलकों के किनारे इसको
तुमने ही तो रखा था...
हाँ...देखो ना...
वो सपना
मैंने सहेज रखा है...
'' मीत जी की रचना

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शनिवार, 22 अगस्त 2009

वो पगली

मै रुका रहता हूँ ,
अक्सर वहीँ ,
जहाँ मिल जाती थीं ,
नजरें उस से ,
और वो मुस्कुरा देती थी .,

अब भी रहता हूँ ,
इन्तजार में , मै,
की निकलेगी कभी ,
फिर मिलेंगी नजरें
और , वो मुस्कुरा देगी

और इसी पश-ओ-पेश में
मेरे ख्यालों में ,
मेरे पागलपन पर,
वो पगली ,
मुस्कुरा देती है


''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ....

कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।
मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥

तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।

नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये।
जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ।।

मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू।
मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ।।

कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से।
कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ।।

कवि : दीपक चौरसिया जी की रचना

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गुरुवार, 20 अगस्त 2009

तफसील

जीने का राज़ , मोहब्बत में पा लिया.
अपनों के दर्द को, अपना बना लिया.
ज़िन्दगी में कोई तनहा न कहे ,
इसलिए दर्द को अपना हमदम बना लिया.
क्वहैशेय तो हर दिल में जनम लेती हैं.
लोग तफसील न करे तुम्हारे बारे में ,
हमने दिल को ही कैदखाना बना लिया.
तुम साथ दो न दो ,तुम्हारे अश्कों
को तो अपना हमसफ़र बना लिया.
नसीब भी वफाई के काबिल नहीं
गमो को अपना रहनुमा बना लिया.
टूट के बिखर न जाओ शीशे की तरह,
मोम से दिल को आज पत्थर बना लिया।

कवि : गुरशरण जी की रचना

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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

क्या हुआ जो मुहँ में घास है



क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!
कवि : राजीव जी की रचना

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सोमवार, 17 अगस्त 2009

ये प्रेम है ......!!

ये प्रेम है ......!!
दुख तो हर हाल में देगा।
तेरे साथ होने पर भी .....
तेरे जाने के मौसम मे भी!
सोचती हूँ ......!!
दुखी होना है अगर हर हाल में......
तो तेरे साथ में रह कर दुखी होना बहतर है ।
रोने को एक कन्धा तो होगा ......
दुश्मन ही सही.... अपना -सा एक बन्दा तो होगा !!
ये प्रेम है .........!!!
दुख तो हर हाल में देगा।
दुख से सुख की अनुभूती है।
प्रेम बिन ज़िन्दगी अधूरी है ।
प्रेम से सारी खुशिया है।
प्रेम बिन ज़िन्दगी सूखी भूमि है।
प्रेम है तो सुन्दरता है।
अनुभूती है ।
खुशिया है ।
दुख है ।
आंसू है ।
संवेदना है ।
सारे रिश्ते नाते है।
जो अपनापन समझता है !!
ये प्रेम है .......
दुख तो हर हाल में देगा !!
दुख तो हर हाल में देगा !!!

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कान्हा जी आप आओ ना

Image:Vijay Kumar Sappatti

कान्हा जी आप आओ ना ......
मेरा मन तुम्हे बुला रहा है !!
अपनी मधुर मुरली सुनाओ ना ....
जो मेरे अन्दर के कोलाहल को मिटा दे !!
अपनी साँवरी छवि दिखा जाओ ना ...
जो मन, आत्मा और शरीर को निर्मल कर दे !!
अपना सुदर्शन चक्र घुमाओ ना ...
जो इस दुनिया की सारी बुराइयों को नष्ट कर दे !!
हर तरफ झूठ ही झूठ है .....
आप सत्या की स्थापना करने आओ ना !
फिर से अपना विराठ रूप दिखाओ ना !!
हे कान्हा ! तुम सारथी बनो .....
जैसे अर्जुन को राह दिखाई थी....
मुझको भी राह दिखाओ ना !!
मेरे हिम्मत टूट रही है .....
मुझको भी गीता का ज्ञान सुनाओ ना !!
जीवन की इस रण भूमि में ....
अपने ही मेरे शत्रु बने है ....
आप ही कोई सच्ची राह दिखाओ ना !!
तड़प रही हूँ इस देह की जंजीरो में ....
मुझको मुक्त कराओ ना !!
भाव सागर में डूब रही हूँ ....
तुम मुझको पार लगओ ना !!
कान्हा जी आप आओ ना ..........
कान्हा जी आप आओ ना ...........

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गुरुवार, 13 अगस्त 2009

दीवाना हूँ , जिन्दगी का तरफदार नहीं हूँ

यही रंग है मेरा मै अदाकार नहीं हूँ
बस बदनाम हूँ मै कलाकार नहीं हूँ

जाओ छोड़ते मुझे हो तो जाओ
बेमुरव्वत नहीं पर मै वफादार नहीं हूँ

तुमने फेंके होंगे पत्थर तोड़ने दिल
फिर भी सम्भला हूँ मै तारतार नहीं हूँ

तुम्हारी कदर है मुझे मगर फिर भी
बिन तुम्हारे खुश हूँ मै बेकार नहीं हूँ

तुमसे मोहब्बत का सिला मै जनता हूँ
पर दीवाना हूँ जिन्दगी का तरफदार नहीं हूँ

''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

प्रेमानुभूती

वक्त का पहिया चलता जाता
नये - नये ये रूप दिखता
हर पल एक सीख दे जाता
कि हमको है बस चलते जाना
बचपन छोड युवा बन जाऊ
चाहत थी कोई अपना पाऊ
मन में उनका अरमान लिये
आंखो में एक सपना लिये
चली जा रही थी कोमल मन अपना लिये
दौडती भागती ज़िन्दगी में
वो मिल गये हमे
आराम की ठंडी सांस की तरह
सांसो से साँसे मिली
और वो दिल के मेहमा हुए
बिना कोई किराया- भाड़ा दिये
कह दिया दिल ने दिल से
सुनो हम तुम्हारे हुए
सपनो में कल तक जो साथ था
अब मेरी उंगली थामे चलने लगा
ऐसा लगा खोया सा कोई
ख्वाब सच होने लगा
वो मुझ में और मैं
उन में खोने लगी
वक्त फिर कुछ और भी महरबा हुआ
और न जाने कब उनका मन मेरा हुआ
आंखो ही आंखो में दुनिया सजी
और दिल एक दूसरे का बसेरा हुआ
चल पड़ी मेरी नैया प्यार की लहर पर
वो इस नैया का खिव्या हुआ
हर दिन मेरा उत्सब और रात मयखाना हुआ
जैसे हर लम्हे पर उनका ही पहरा हुआ
उसके होठो ने मेरे होठो को छू कर कहा
कि उम्र भरके लिये मैं तेरा हुआ
तुझ में खो कर ही तो घर मेरा

फूलो का बगीचा हुआ
जब उसने अपनी अखियाँ खोली
घर मेरा रोशन हुआ
जब गूंजी उसकी किलकारी
तेरा मेरा सपना हमारा हुआ
उसने हंस कर भर दी हमारी झोली
तभी तो हमारा प्यार पूरा हुआ
उसका सपना ही अब हमारा सपना हुआ
देखते ही देखते अपना दुलारा
किसी और का साजना हुआ
हंस - रो कर जी लिया हर पल
प्यार नही , पर अब शरीर बूढ़ा हुआ
पर तेरा प्यार दिन -दिन
और भी गहरा हुआ
जब छोटू का छोटू
चश्मे से तेरे खेला किया
फिर मेरा हास के कहना
अब तो तू बूढा हुआ
आँख भर आई मेरे
जब मेरा पल्लु पकड़ भर
तेरा यू कहना हुआ
खुशी है की तेरे साथ में बूढा हुआ
हम हमेशा साथ होंगे मेरा फिर कहना हुआ
और फैल गया हमारा प्यार
एक अविरल धार-सा हर तरफ
वक्त की आँधी चली और तुफा आ गया
तेरे कंधे पर साज कर
ये तन मेरा इस दुनिया से रुख्सत हुआ
और इस मिट्टी का मिट्टी में ही मिलना हुआ
जब तू रोया फूट कर तो आत्मा चिल्ला उठी
मैं दूर नही हूँ तुमसे
मिट्टी थी मिट्टी में मिल गई
पर मन और आत्मा का तुम से ही संगम हुआ
और जब तुम अकेला होते हो उस आराम कुर्सी पर
मैं देखती हूँ तुम्हे, और तुम भी तो महसूस करते हो
जब ढूंढते हो खुद में ही
और दीवारो से मेरे बातैं करते हो
तो ये पीड़ा मुझ से सही नही जाती
तुम से मिलने को तड़प उठती है मेरे रुह
तब में खुद से वादा करती हूँ
हर जन्म तेरे ही पत्नी बनने का इरादा रखती हूँ
जब मिलैगे साँवरे के द्वार पर हम
तब रुह की रुह से मुलाकात होगी
और हमारे लौकिक नही अलोकिक प्रेम की शुरुआत होगी
और वहाँ मृत्यु का बंधन नही होगा
वहा अमित अमर प्रेम होगा .....
बस प्रेम....हमारा प्रेम
और ये वक्त जिसने हमे मिलाया
हमे दूर करने में लाचार होगा

अगर कुछ शेष होगा तो वो होगा हमारा प्रेम

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शनिवार, 1 अगस्त 2009

जन्मदिन पर मेरी बड़ाई

लंबी अमर हो प्रार्थना करूँगी भइया ।
आप का साथ न छूटे दुआ करूँगी भइया ॥

जीवन के रास्ते चाहे कठिन है।
आप साथ देना में लडूँगी भइया॥

सफलता चूमे आप के कदम।
हमेशा मन से सदा कहूंगी भइया॥

पता है हमे रूठे हो हम से ।
पर बहन तो आप की ही रहूँगी भइया॥

देने को पास कुछ भी नही है।
लेलो जन्मदिन पर मेरी बड़ाई भइया॥

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इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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