संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है

क्या बताये हम कि क्या हुवा है
सुलगता हुवा दिल का आशिया है
 
कही दम घुट ना जाए सीने मे
हर एक सिम्त धुवा ही धुवा है
 
वादों -कसमो कि लाज रखनी है
हम कैसे कह दे कि तू बेवफा है
 
मुझको ना यादो पे यकी है अब
ख्यालो से तो अपना सिलसिला है
 
मेरे दिल मे तेरी चाहत है अब भी
मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है
 
कवि: रोहित कुमार "मीत"  जी की रचना

5 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 25 अगस्त 2009 को 10:29 am  

रोहित कुमार "मीत" जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

sarwat m 25 अगस्त 2009 को 12:21 pm  

मैं हर उस व्यक्ति का नमन करता हूँ जो स्वयं लेखन करता है, किसी से लिखवाता नहीं. लेकिन मैं स्पष्ट बोलता हूँ, शायद यही वजह है कि बहुत से लोग मुझे पसंद नहीं करते. आप के लेखन को प्रणाम, किन्तु अभी बहुत कच्चापन है. किसी विद्वान से कुछ अरसे इस विद्या पर कोचिंग लें, आप की प्रतिभा में निखार आ जायेगा.
(यदि मेरा कमेन्ट पसंद न आया हो तो इसे डिलीट कर दीजियेगा फिर भी, कच्चापन तो बरकरार रहेगा ही ).

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 25 अगस्त 2009 को 3:35 pm  

सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए आभार!

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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