संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

एक प्यारी से सुबह से शुरू है

एक प्यारी से सुबह से शुरू है
ज़िन्दगी नये साल की तरह
जन्म जन्म पल रंग बदलती है
दिन और रात की तरह
इसके भी मौसम चार है
सर्दी , गर्मी, मानसून और बरसात की तरह
हर दिन एक पन्ना है ......
धूप - छाव की तरह
हर पल कुछ सीखता है
माँ - बाप की तरह
हर लम्हा गुज़र जाता है
शरीर से प्राण की तरह

फिर नया साल आता है
एक नई जन्म की तरह
इसी तरह चलता जाता है
वक्त का पहिया पिचास की तरह
सब कुछ बदल जाता है
बंद पालक के ख्वाब की तरह
रह जाते है कुछ अनुभव
कडी धूप में छाया की तरह

जीवन चलता जाता है
बिना थके , बिना रुके , अपनी गति संभाले
सीखता -सिखाता, हसाता – रुलता, बनाता - मिटाता,
हर पल को जी लैं एक जीवन की तरह
एक प्यारी से सुबह से शुरू है ज़िन्दगी नये साल की तरह

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गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

रखा क्या है अहंकार में....!!

बदलने लगी हूँ ......
तेरे प्यार में!!

खोने लगी हूँ ......
तेरी राह में!!

सब से अलग हूँ ......
मैं संसार में!!

जब से जुड़ी हूँ ......
तेरे साथ में!!

संभालने लगी हूँ ......
मझधार में!!

बस गया बस तू ही तू ......
मेरी हर सांस में!!

आता मजा है ......
अब तिरस्कार में!!

डूबी हूँ तुझ में ......
रखा क्या है अहंकार में ???

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शनिवार, 12 दिसंबर 2009

वो तजुर्बा भी बेकार हुआ

बाद तेरे किसी का भी ऐतबार हुआ
एक जो था वो तजुर्बा भी बेकार हुआ

तुझे थे ही नहीं पसंद इंसान यहाँ के
खुदाया दिल कुरबां क्यूँ कई बार हुआ

तुम्हे देखने की तमन्ना हर रात रही
और तुझे भूलना भी हर सुबह यार हुआ

तुम मिले नहीं और रही कई ख्वाहिश दिल में
ऐसे ही अकेले दिल आंसुओं का कुनबादार हुआ

बस माँगा था तुझे और खुदा अब दिखता नहीं
पहली बार किसी शक्श से खुदा शर्मशार हुआ

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सोमवार, 7 दिसंबर 2009

उन्हें क्या मालूम

सुर्ख आँखों में अदा है , उन्हें क्या मालूम
ये हसीनो की खता है , उन्हें क्या मालूम

हम तो दीवाने हुए सर कलम करा बैठे
ये राह-ऐ-वफ़ा है , उन्हें क्या मालूम

वो आज आये हैं महफ़िल में अजाँ करते हुए
कोई बतलाये खुदा है , उन्हें क्या मालूम

उनकी ग़ज़लों में असर है तन्हाई का
कोई खौफज़दा है , उन्हें क्या मालूम

उनकी तबियत खिली रहे हमेशा ''अजीत''
ये नमाज़ अता है , उन्हें क्या मालूम

कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

रुख्सर


मेरे जीने के लिये एक आसरा दर्करर था,
दुनिया गम देती गयी मेरी गुज़र होती गयी ।
जल्वे मचल गये तो सेहर का गुमा हुआ ,
ज़ुल्फे बिखर गयी तो सैअह रात हो गयी ।
हमें आपनो के सितम याद आये,
जब भी गरोन की इनायत देखी ।
तमस सी भरी ज़िन्दगी में ,
उमीद की रोशनी देखी।
न जाने क्यूँ हक़ीकत तस्वूर से दर हो गयी,
आन्सोन से पल्को को भिगोने की तम्मना,
भी हमसे रुख्सर हो गयी ।

कवि : गुरुशरण जी की रचना

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बुधवार, 2 दिसंबर 2009

यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है


यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है
मेरे तो चारों तरफ आग ही आग है!!
कितनी अकुलाहट भरी है जिन्दगी
हर तरफ चीख-पुकार भागमभाग है!!
अब तो मैं अपने ही लहू को पीऊंगा
इक दरिंदगी भरी अब मेरी प्यास है!!
मेरे भीतर तो तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा
मुझपर ऐ दोस्त अंधेरों का लिबास है!!
हर तरफ पानियों के मेले दिखलाती है
उफ़ ये जिंदगी है या कि इक अजाब है!!
हर लम्हा ऐसा गर्मियत से भरा हुआ है
ऐसा लगता है कि हयात इक आग है !!
हम मर न जाएँ तो फिर करें भी क्या
कातिल को हमारी ही गर्दन की आस है!!
रवायतों को तोड़ना गलत है "गाफिल"
यही रवायतें तो शाखे-दरख्ते-हयात हैं!!
कवि : राजीव जी की रचना

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शनिवार, 7 नवंबर 2009

ये प्यास पीते,और भूख खाते है


यू ही नहीं किसान पूजे जाते है
ये प्यास पीते,और भूख खाते है

बेबसी के आसू मे आँचल भीगा
उसे हमदर्दी की धूप मे सुखाते है

जिस्म का बोझ नहीं उठता हमसे
और ये खेतो मे गठ्ठर उठाते है

करते है शाद्ध बड़ी श्रद्धा के साथ
मरने के बाद भी रिश्ता निभाते है
 
 
कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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ये पत्थर की दुनिया है .....!!

ये पत्थर की दुनिया है । 
खव्बो को संभाले रखना ।।
 
ले रक्खा है हाथो में नामक ।
अपने घवो को बचाकर रखना।।
 
ठोकर पर सहारा भी तुम को न मिलेगा ।
अगर गिरो तो उठने का होसला रखना ।।
 
रूठ जायगी खुशी एक दिन ।
इस लिये गम को अपना यार बना कर रखना ।।
 
सलामत रहे हर रिश्ता।
दुआ में अपना हाथ उठाये रखना।।
 
उसकी सत्ता का कोई सामी भी नही है ।
बस अपने सर को उसके  सज्दे में झुकाये रखना ।।

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गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मन चंचल गगन पखेरू है,

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,
की किससे चाह है मुझको.
वो बस हालात ऐसे थे,
कि बुरा मैं बन नहीं पाया.
मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,
कोई समझाए तो इसको.
ज़माने की हवा है ये,
ये रूहानी नहीं साया.
मगर ताबीज़ ला दो तुम,
तसल्ली गर मिले तुमको.
उसे लम्हे डराते हैं,
कल की गम की रातों के,
है सूरज हर घड़ी देता,
ख़ुशी की रौशनी जिसको.
  
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

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बुधवार, 23 सितंबर 2009

हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,

 
 
जो छूट गई है दुनिया में,, मेरी ही कुछ हस्ती थी
साहिल छोर के दरिया डूबी , मजबूत बड़ी वो कश्ती थी

उनका घर तो रौशन था पर डर था सबके चेहरे पर
एक उनके घर में रौनक थी और जलती सारी बस्ती थी

कुछ जिन्दा और मुर्दा लड़ते अल्लाह ईश के नाम पर
खामोशी मजबूरी थी कुछ जान यहाँ पर सस्ती थी

तूफानों को रंज बहुत था और चरागाँ जलते थे
कुछ अरमानो की दुनिया थी कुछ मौत यहाँ पर हस्ती थी

दिल लाख छुपाओ ताले में कोई चोर चुरा ले जायेगा
हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,
 
 
''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना
 

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मंगलवार, 15 सितंबर 2009

सो जा ......

सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
तेरी चंदा जैसी माता
तेरे पिता है विधाता
और तू है सब की आँखों का तारा
सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
तेरे नन्ही नन्ही आंखे
इनमें सपने कितने सरे
इन सपनो में कही तू खो जा
सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
ला ला .....हम्म ....ला ला ......ला ला .....हम्म ....ला ला
ला ला .....हम्म ....ला ला .....ला ला .....हम्म ....ला ला

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शनिवार, 12 सितंबर 2009

फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,
तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .
उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,
क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.
तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे,
अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.
माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे.
फिर रोटियों के चोर कितने, भूखे पीटे जायेंगे,
फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना


 

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

शामिल है.

लहू पहाड़ के दिल का, नदी में शामिल है,
तुम्हारा दर्द हमारी ख़ुशी में शामिल है.
तुम अपना दर्द अलग से दिखा न पाओगे,
तेरा जो दर्द है वो मुझी में शामिल है.

गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,
जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.
दूर कितनी भी रहूँ, खोलोगे जब भी आँख तुम,
मैं सिरहाने पर तुम्हारे जागती मिल जाऊँगी.
घर के बाहर जब कदम रखोगे अपना एक भी,
बनके मैं तुमको तुम्हारा रास्ता मिल जाऊँगी.
मुझपे मौसम कोई भी गुज़रे ज़रा भी डर नहीं,
खुश्क टहनी पर भी तुमको मैं हरी मिल जाऊँगी.
तुम ख्यालों में सही आवाज़ देके देखना,
घर के बाहर मैं तुम्हें आती हुई मिल जाऊँगी.
गर तसब्बुर भी मेरे इक शेर का तुमने किया,
सुबह घर कि दीवारों पर तुम्हें लिखी हुई मिल जाऊँगी।

कवि : 'बीती ख़ुशी' जी की रचना

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बुधवार, 9 सितंबर 2009

मैं तेरे साथ - साथ हूँ।।

देखो तो एक सवाल हूँ
समझो तो , मैं ही जवाब हूँ ।।

उलझी हुई,इस ज़िन्दगी में।
सुलझा हुआ-सा तार हूँ।।

बैठे है दूर तुमसे , गम करो
मैं ही तो बस, तेरे पास हूँ।।

जज्वात के समन्दर में दुबे है।
पर मैं ही , उगता हुआ आफ़ताब हूँ

रोशनी से भर गया सारा समा
पर मैं तो, खुद ही में जलता हुआ चिराग हूँ ।।

जैसे भी ज़िन्दगी है, दुश्मन तो नही है।
तन्हा-सी हूँ मगर, मैं इसकी सच्ची यार हूँ।।

जलते हुए जज्वात , आंखो से बुझेंगे
बुझ कर भी बुझी, मैं ऐसी आग हूँ।।

कैसे तुम्हे बता दें , तू ज़िन्दगी है मेरी
अच्छी या बुरी जैसे भी, मैं घर की लाज हूँ ।।

कुछ रंग तो दिखाएगी , जो चल रहा है अब।
खामोशी के लबो पर छिड़ा , में वक्त का मीठा राग हूँ।।

कलकल-सी वह चली, पर्वत को तोड़ कर
मैं कैसे भूल जाऊ, मैं बस तेरा प्यार हूँ।।

भुजंग जैसे लिपटे है , चंदन के पेड़ पर
मजबूरियों में लिपटा हुआ , तेरा ख्बाव हूँ।।

चुप हूँ मगर , में कोई पत्थर तो नही हूँ।
जो तुम कह सके, मैं वो ही बात हूँ

बस भी कर, के तू मुझको याद
वह सकेगा जो, में ऐसा आव हूँ।।

मेहदी बारातै सिन्दूर चाहिए
मान लिया हमने जब तुम ने कह दिया , मैं तेरा सुहाग हूँ।।

खुद को समझना, कभी तन्हा और अकेला।
ज़िन्दगी के हर कदम पर , मैं तेरे साथ - साथ हूँ।।

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मंगलवार, 8 सितंबर 2009

मन किया

आज न जाने क्यूँ रोने को मन किया।
माँ के आंचल में सर छुपा के सोने को मन किया।
दुनिया की इस भाग दौड़ में,खो चुका था रिश्तेय सब।
आज फिर उन रिश्तो को इक सिरे से संजोने का मन किया।
दिल तोद्ता हूँ सब का अपनी बातों से,
लड़ने का मन भी तो आपनो के मन से किया।
ता उमर जिसे भुला नही सकते ,
आज उणोह्ने हमें भुलाने का मन किया।
शिकवा भी तो आपनो से होती है,
क्या हुआ जो उन्हे ग़म देने का मन किया।

कवि : गुरशरण जी की रचना

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सोमवार, 7 सितंबर 2009

मेरी बेबसी देखिये

बना डाला खुदा उफ़ ये बंदगी देखिये
अकीदते-बाज़ार मे खडा आदमी देखिये

समंदर भी लगने लगा है दरिया मुझे
भड़की है एक कदर तिशनगी देखिये

हर बार आईने मे शक्ल नयी सी दिखे
कितने हिस्से मे बट गयी जिंदगी देखिये

रो देते है तन्हाई मे खुद से बाते कर"मीत"
गर मिले फ़ुर्सत तो मेरी बेबसी देखिये

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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शनिवार, 5 सितंबर 2009

आपको मेरा नमन है.....!!!

यह कविता में अपने गुरुओ के लिये लिख रही हूँ , आज में जो कुछ भी हूँ बस उनकी ही कॄपा है। ईश्वर से प्रार्थना है की उनका हाथ सदा मेरे सर पर रहे।



मैं थी शिशु
अज्ञान - अबोध - अचेतन
सभी से अन्भिज्ञा थी मैं
उसने अपनों से परिचित कराया
जीवन की पाठशाला का
उसी से पहला पाठ पाया
प्रथम गुरु !! सर्वोच्च माता को मेरा नमन है ।

पशुतव से जो मनात्तव तक ले आये
आप ज्ञान के दर्पण हो
आपको मेरा नमन है ।

अपने ही भावो को व्यक्त करना सिखाया
आप शब्द दाता है
आपको मेरा नमन है ।

अज्ञान के तिमिर को हर कर
जो ज्ञान दीप आपने जलाये
आपको मेरा नामन है ।

आप स्वयं जले "पर" की खातिर
जीवन में ज्ञान के जुगनू जलाये
आपको मेरा नामन है ।

आप मेरे जीवन में मेरूदंड बन कर खड़े है
हर क्षण मुझे रास्ता दिखाये, आप वो दिये हो
आपको मेरा नामन है।

आप बिन जीवन कैसा जीवन
कल्पना करना कठिन है
कल्पना करना सिखाया
आपको मेरा नमन है ।

अंधेरी ज़िन्दगी में
ज्ञान की किरणे बिखेरी
कभी प्यार कभी फटकार से
जीवन की बगिया सहेजी
आप बागवान हो
आप को मेरा नामन है।

जहाँ भी हुआ अंधेरा
आप बन कर प्रभात आये
अपने साथ अक्षय ज्ञान रत्नो की सौगात लाये
क्या है ये संसार हम जान पाये
आपको मेरा नमन है।

मेरे जीवन में सदा
आप का दर्जा प्रथम है
ईश्वर के उस अंश को
मेरा नमन
शत-शत नमन है .....!!

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गुरुवार, 3 सितंबर 2009

कुछ दिलजलों को

उतरने लगा है
नाकाम मोहब्बत का नशा
जिन्दगी जीने की जद-ओ-जहद
फिर आडे आ रही
यादों का बोझ उठाने में

बड़ा हूँ तो
बोझ भी उठाना है घर का

तो तुम्हे याद करने का
एक नायब तरीका ढूंड निकाला है
जिस से रोजी भी चलती रहती है

बस यूँ करता हूँ की
रोज कमाई की खातिर
तुम्हारी एक याद को
एक कागज पर लिखकर
बेच देता हूँ
कुछ दिलजलों को
 
कवि: अजीत त्रिपाठी जी की रचना

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बुधवार, 2 सितंबर 2009

है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.

क्या खूब पायी थी उसने अदा।
ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह॥


कतरे गए कई परिंदों के पर।
सबको खेला था वो बाजियों की तरह॥


हौसला नाम से रब के देता रहा।
फैसला कर गया काजिओं की तरह


ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर।
करके छोडा हमें हाशिओं की तरह


साहिलों को मिलाने की जुंबिश तो थी।
खुद का साहिल था माझिओं की तरह


जिनको दिल से लगा 'मशाल' शायर बना।
है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह॥



कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना

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मंगलवार, 1 सितंबर 2009

पूछता रहता है क्या

ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,
ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.
जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश करना क्या,
इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.
खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,
गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है क्या.
कोई मंतर नहीं ऐसा, जो आदमियत जिला सके,
कान में इस मुर्दे के, तू फूंकता रहता है क्या.
आएँगी कहाँ वो खुशबुएँ, अब इनमें 'मशाल',
दरारों में दरके रिश्तों की, सूंघता रहता है क्या.

कवि : दीपक 'मशाल' जी की रचना

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शनिवार, 29 अगस्त 2009

ये किसानो की है हकीक़त क्या बात

आदमी मे आदमीयत क्या बात है
हर-एक की नेक नीयत क्या बात है

साकी ने शराब मे क्या शै मिला दी
वाएज़ को भी दी नसीहत क्या बात है

बदमिजाज़ हुवा शहर नए दौर के नाम पे
संस्कृति की ये फजीहत क्या बात है

माँ-बाप भगवान सामान यहाँ और
पत्थरों मे भी अकीदत क्या बात है

भूख खाते है और प्यास पीते है"मीत"
ये किसानो की है हकीक़त क्या बात है

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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गुरुवार, 27 अगस्त 2009

फिर नाम कैसे ले

रिश्ता कातिल से रहनुमा का।
जैसे आजाब दोस्त की दुवा का॥

उम्र भर अब दर्दे-जुदाई सहना है।
मिला है ये शिला मुझे वफ़ा का॥

इंसानियत से देखो तुम इन्सा को।
मिल जायेगा रास्ता तुम्हे खुदा का॥

बच्चो मे तलाश कर उसे पा भी लो ।
देरो-हरम से नहीं वास्ता देवता का ॥

ख्यालो को ख्यालो मे नहीं आने देते।
फिर नाम कैसे ले"मीत" उस बेवफा का॥

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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बुधवार, 26 अगस्त 2009

सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए.....


कभी मैं चल नहीं पाया, कभी वो रुक नहीं पाए।
मेरे जो हमसफ़र थे, साथ वो रह नहीं पाए।।

मेरे घर में नहीं आई, कितने सालों से दीवाली।
तू आ जाये तो आँगन में, अँधेरा रह नहीं पाए।।

लगाते हैं सभी तोहमत, मैं तुझसे हार जाता हूँ।
मेरी हस्ती ही ऐसी है, कि कोई टिक नहीं पाए।।

मैं माँझी हूँ मगर खुद न, कभी उस पार जा पाया।
मेरे अरमाँ ही लहरों पे, कभी भी बह नहीं पाए।।

कमर टूटी नहीं मेरी, किसी की जी-हुजूरी से।
बोझ बढ़ता गया हर पल, पर काँधे झुक नहीं पाए।।

ना फ़रेब कह देना, सिला-ए-चाहत कों 'मशाल'।
सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए।।

कवि : दीपक 'मशाल' जी की रचना

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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है

क्या बताये हम कि क्या हुवा है
सुलगता हुवा दिल का आशिया है
 
कही दम घुट ना जाए सीने मे
हर एक सिम्त धुवा ही धुवा है
 
वादों -कसमो कि लाज रखनी है
हम कैसे कह दे कि तू बेवफा है
 
मुझको ना यादो पे यकी है अब
ख्यालो से तो अपना सिलसिला है
 
मेरे दिल मे तेरी चाहत है अब भी
मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है
 
कवि: रोहित कुमार "मीत"  जी की रचना

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रुलाकर मुझको वो भी तो रोया होगा

रुलाकर मुझको वो भी तो रोया होगा

जगाकर मुझको वो भी न सोया होगा


चलो उसे हमदर्दी की धूप मे सुखा ले

जो तकिया उसने आसुवों से भिगोया होगा
 
कवि: रोहित कुमार "मीत"  जी की रचना
 

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सोमवार, 24 अगस्त 2009

मैंने वो सपना सहेज रखा है...

उनींदी स्याह रातों में...
रिश्तों की उलझी डोर से,
जिसे तुमने बुना था,
वो सपना...
मैंने सहेज रखा है...
हाँ वही सपना...!!
जो तुम्हें जान से प्यारा था..
वही सपना...
जो तुम्हारे मन का सहारा था...
पलकों की चादर फैंक,
आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...
जब रोकता हूँ इसको
तो घंटो छटपटाता है...
ना जाने देना इसको
तुमने ही तो कहा था,
पलकों के किनारे इसको
तुमने ही तो रखा था...
हाँ...देखो ना...
वो सपना
मैंने सहेज रखा है...
'' मीत जी की रचना

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शनिवार, 22 अगस्त 2009

वो पगली

मै रुका रहता हूँ ,
अक्सर वहीँ ,
जहाँ मिल जाती थीं ,
नजरें उस से ,
और वो मुस्कुरा देती थी .,

अब भी रहता हूँ ,
इन्तजार में , मै,
की निकलेगी कभी ,
फिर मिलेंगी नजरें
और , वो मुस्कुरा देगी

और इसी पश-ओ-पेश में
मेरे ख्यालों में ,
मेरे पागलपन पर,
वो पगली ,
मुस्कुरा देती है


''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ....

कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।
मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥

तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।

नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये।
जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ।।

मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू।
मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ।।

कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से।
कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ।।

कवि : दीपक चौरसिया जी की रचना

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गुरुवार, 20 अगस्त 2009

तफसील

जीने का राज़ , मोहब्बत में पा लिया.
अपनों के दर्द को, अपना बना लिया.
ज़िन्दगी में कोई तनहा न कहे ,
इसलिए दर्द को अपना हमदम बना लिया.
क्वहैशेय तो हर दिल में जनम लेती हैं.
लोग तफसील न करे तुम्हारे बारे में ,
हमने दिल को ही कैदखाना बना लिया.
तुम साथ दो न दो ,तुम्हारे अश्कों
को तो अपना हमसफ़र बना लिया.
नसीब भी वफाई के काबिल नहीं
गमो को अपना रहनुमा बना लिया.
टूट के बिखर न जाओ शीशे की तरह,
मोम से दिल को आज पत्थर बना लिया।

कवि : गुरशरण जी की रचना

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मंगलवार, 18 अगस्त 2009

क्या हुआ जो मुहँ में घास है



क्या हुआ जो मुहँ में घास है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो चोरों के सर पर ताज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो गरीबों के हिस्से में कोढ़ ओर खाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो अब हमें देशद्रोहियों पर नाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो सोने के दामों में बिक रहा अनाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो आधे देश में आतंकवादियों का राज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या जो कदम-कदम पे स्त्री की लुट रही लाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर आम आदमी हो रहा बर्बाद है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो हर शासन से सारी जनता नाराज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
क्या हुआ जो देश के अंजाम का बहुत बुरा आगाज है
अरे कम-से-कम देश तो आजाद है.....!!
इस लोकतंत्र में हर तरफ से रही गालियों की आवाज़ है
बस इसी तरह से मेरा यह देश आजाद है....!!!!
कवि : राजीव जी की रचना

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सोमवार, 17 अगस्त 2009

ये प्रेम है ......!!

ये प्रेम है ......!!
दुख तो हर हाल में देगा।
तेरे साथ होने पर भी .....
तेरे जाने के मौसम मे भी!
सोचती हूँ ......!!
दुखी होना है अगर हर हाल में......
तो तेरे साथ में रह कर दुखी होना बहतर है ।
रोने को एक कन्धा तो होगा ......
दुश्मन ही सही.... अपना -सा एक बन्दा तो होगा !!
ये प्रेम है .........!!!
दुख तो हर हाल में देगा।
दुख से सुख की अनुभूती है।
प्रेम बिन ज़िन्दगी अधूरी है ।
प्रेम से सारी खुशिया है।
प्रेम बिन ज़िन्दगी सूखी भूमि है।
प्रेम है तो सुन्दरता है।
अनुभूती है ।
खुशिया है ।
दुख है ।
आंसू है ।
संवेदना है ।
सारे रिश्ते नाते है।
जो अपनापन समझता है !!
ये प्रेम है .......
दुख तो हर हाल में देगा !!
दुख तो हर हाल में देगा !!!

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कान्हा जी आप आओ ना

Image:Vijay Kumar Sappatti

कान्हा जी आप आओ ना ......
मेरा मन तुम्हे बुला रहा है !!
अपनी मधुर मुरली सुनाओ ना ....
जो मेरे अन्दर के कोलाहल को मिटा दे !!
अपनी साँवरी छवि दिखा जाओ ना ...
जो मन, आत्मा और शरीर को निर्मल कर दे !!
अपना सुदर्शन चक्र घुमाओ ना ...
जो इस दुनिया की सारी बुराइयों को नष्ट कर दे !!
हर तरफ झूठ ही झूठ है .....
आप सत्या की स्थापना करने आओ ना !
फिर से अपना विराठ रूप दिखाओ ना !!
हे कान्हा ! तुम सारथी बनो .....
जैसे अर्जुन को राह दिखाई थी....
मुझको भी राह दिखाओ ना !!
मेरे हिम्मत टूट रही है .....
मुझको भी गीता का ज्ञान सुनाओ ना !!
जीवन की इस रण भूमि में ....
अपने ही मेरे शत्रु बने है ....
आप ही कोई सच्ची राह दिखाओ ना !!
तड़प रही हूँ इस देह की जंजीरो में ....
मुझको मुक्त कराओ ना !!
भाव सागर में डूब रही हूँ ....
तुम मुझको पार लगओ ना !!
कान्हा जी आप आओ ना ..........
कान्हा जी आप आओ ना ...........

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गुरुवार, 13 अगस्त 2009

दीवाना हूँ , जिन्दगी का तरफदार नहीं हूँ

यही रंग है मेरा मै अदाकार नहीं हूँ
बस बदनाम हूँ मै कलाकार नहीं हूँ

जाओ छोड़ते मुझे हो तो जाओ
बेमुरव्वत नहीं पर मै वफादार नहीं हूँ

तुमने फेंके होंगे पत्थर तोड़ने दिल
फिर भी सम्भला हूँ मै तारतार नहीं हूँ

तुम्हारी कदर है मुझे मगर फिर भी
बिन तुम्हारे खुश हूँ मै बेकार नहीं हूँ

तुमसे मोहब्बत का सिला मै जनता हूँ
पर दीवाना हूँ जिन्दगी का तरफदार नहीं हूँ

''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

प्रेमानुभूती

वक्त का पहिया चलता जाता
नये - नये ये रूप दिखता
हर पल एक सीख दे जाता
कि हमको है बस चलते जाना
बचपन छोड युवा बन जाऊ
चाहत थी कोई अपना पाऊ
मन में उनका अरमान लिये
आंखो में एक सपना लिये
चली जा रही थी कोमल मन अपना लिये
दौडती भागती ज़िन्दगी में
वो मिल गये हमे
आराम की ठंडी सांस की तरह
सांसो से साँसे मिली
और वो दिल के मेहमा हुए
बिना कोई किराया- भाड़ा दिये
कह दिया दिल ने दिल से
सुनो हम तुम्हारे हुए
सपनो में कल तक जो साथ था
अब मेरी उंगली थामे चलने लगा
ऐसा लगा खोया सा कोई
ख्वाब सच होने लगा
वो मुझ में और मैं
उन में खोने लगी
वक्त फिर कुछ और भी महरबा हुआ
और न जाने कब उनका मन मेरा हुआ
आंखो ही आंखो में दुनिया सजी
और दिल एक दूसरे का बसेरा हुआ
चल पड़ी मेरी नैया प्यार की लहर पर
वो इस नैया का खिव्या हुआ
हर दिन मेरा उत्सब और रात मयखाना हुआ
जैसे हर लम्हे पर उनका ही पहरा हुआ
उसके होठो ने मेरे होठो को छू कर कहा
कि उम्र भरके लिये मैं तेरा हुआ
तुझ में खो कर ही तो घर मेरा

फूलो का बगीचा हुआ
जब उसने अपनी अखियाँ खोली
घर मेरा रोशन हुआ
जब गूंजी उसकी किलकारी
तेरा मेरा सपना हमारा हुआ
उसने हंस कर भर दी हमारी झोली
तभी तो हमारा प्यार पूरा हुआ
उसका सपना ही अब हमारा सपना हुआ
देखते ही देखते अपना दुलारा
किसी और का साजना हुआ
हंस - रो कर जी लिया हर पल
प्यार नही , पर अब शरीर बूढ़ा हुआ
पर तेरा प्यार दिन -दिन
और भी गहरा हुआ
जब छोटू का छोटू
चश्मे से तेरे खेला किया
फिर मेरा हास के कहना
अब तो तू बूढा हुआ
आँख भर आई मेरे
जब मेरा पल्लु पकड़ भर
तेरा यू कहना हुआ
खुशी है की तेरे साथ में बूढा हुआ
हम हमेशा साथ होंगे मेरा फिर कहना हुआ
और फैल गया हमारा प्यार
एक अविरल धार-सा हर तरफ
वक्त की आँधी चली और तुफा आ गया
तेरे कंधे पर साज कर
ये तन मेरा इस दुनिया से रुख्सत हुआ
और इस मिट्टी का मिट्टी में ही मिलना हुआ
जब तू रोया फूट कर तो आत्मा चिल्ला उठी
मैं दूर नही हूँ तुमसे
मिट्टी थी मिट्टी में मिल गई
पर मन और आत्मा का तुम से ही संगम हुआ
और जब तुम अकेला होते हो उस आराम कुर्सी पर
मैं देखती हूँ तुम्हे, और तुम भी तो महसूस करते हो
जब ढूंढते हो खुद में ही
और दीवारो से मेरे बातैं करते हो
तो ये पीड़ा मुझ से सही नही जाती
तुम से मिलने को तड़प उठती है मेरे रुह
तब में खुद से वादा करती हूँ
हर जन्म तेरे ही पत्नी बनने का इरादा रखती हूँ
जब मिलैगे साँवरे के द्वार पर हम
तब रुह की रुह से मुलाकात होगी
और हमारे लौकिक नही अलोकिक प्रेम की शुरुआत होगी
और वहाँ मृत्यु का बंधन नही होगा
वहा अमित अमर प्रेम होगा .....
बस प्रेम....हमारा प्रेम
और ये वक्त जिसने हमे मिलाया
हमे दूर करने में लाचार होगा

अगर कुछ शेष होगा तो वो होगा हमारा प्रेम

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शनिवार, 1 अगस्त 2009

जन्मदिन पर मेरी बड़ाई

लंबी अमर हो प्रार्थना करूँगी भइया ।
आप का साथ न छूटे दुआ करूँगी भइया ॥

जीवन के रास्ते चाहे कठिन है।
आप साथ देना में लडूँगी भइया॥

सफलता चूमे आप के कदम।
हमेशा मन से सदा कहूंगी भइया॥

पता है हमे रूठे हो हम से ।
पर बहन तो आप की ही रहूँगी भइया॥

देने को पास कुछ भी नही है।
लेलो जन्मदिन पर मेरी बड़ाई भइया॥

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शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

आदमी


हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,
फिर भी तणियोन का शिकार आदमी ।

रोज़ जीता हुआ, रोज़ मारता हुआ,
ज़िन्दगी से लड़ता हुआ आदमी ।

सब कुछ छूट जायेगा यही पर ,
मोह माया में जीता हुआ आदमी।

आपनि मंज़िल से हैं अनजान हैं आदमी ,
फिर भी मुसाफ़िर हैं यह आदमी ।

मिलता हैं रोज़ एक नया आदमी ,
लेकिन जीवन की दगर पे ,

हर पल अकेला आदमी । 
हर पल अकेला आदमी । 
 
कवि :  भाई गुरशरण जी की रचना

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गुरुवार, 30 जुलाई 2009

मुझे भी महजबी अपना गुलाम कर दे

बिखरा के जुल्फे फ़िर शाम कर दे
कुछ हसी पल आज मेरे नाम कर दे

मुद्दत से बहता है ये दरिया बनकर
अपने होठो से छूकर इसे जाम कर दे

अब तलक छुपा रखा है जो हिजाब मे
उठाकर परदा जलवा- ऐ-आम कर दे

कैद कर जलवा-ऐ-हुस्न की जंजीर से
मुझे भी महजबी अपना गुलाम कर दे
 
कवि: रोहित कुमार "मीत"  जी की रचना

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मंगलवार, 28 जुलाई 2009

जो करनी हो मोहब्बत

जो करनी हो मोहब्बत
जो करनी हो मोहब्बत तो ,बेवजा करना
और जो हो जाये तो डूबकर ,रजा करना

मै करूँ गलतियाँ जो मचल जाओ तुम
लुत्फ़-ऐ-दीदार करना और ,मजा करना

तुम्हारी खैरियत मेरी जिम्मेदारी रहेगी
मेरे लिए अपनी ही नमाज़ ,अजां करना

रूठना तो रोना गले लगकर, मना लूँगा
दूर होकर दिल-ऐ-नादान को ना सजा करना

कभी हो मौका तो आ जाना और लिपट जाना
रश्म-ओ-रिवाज से एक बार दगा करना

सुनो गर ना रहूँ शरीक-ऐ-जन्नत हो जाऊँ
मुस्कुराना और मोहब्बत का फ़र्ज़ अदा करना

अगर ऐसे ही छोड़ जाऊँ दुनिया मै ''अजीत''
कफ़न में आँचल रख आगोश-ऐ-कज़ा करना
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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गुरुवार, 23 जुलाई 2009

सच कहता हूँ


सच कहता हूँ
प्रेम निश्वार्थ था तुमसे मुझे
पर तुम्हारे जाने का दर्द
सृजन का माध्यम बन गया ,,,

मै रह ही नहीं पाया
समर्पित
प्रेम के कलरव एकांत के प्रति
न नव सुरम्य जीवन साध्य के प्रति
हर लम्हे को उतारा है मैंने
शब्दों से दिल के बाहर भी
नयन सुख से मिलन की हर बेला तक
मैंने समर्पण को समर्पित कर दिया है ,,

पर अभी भी एक रिश्ता है तुम्हारा
मेरे सृजन से
दर्द ,, दोनों में है ,,,,

तो सोचता हूँ
त्याग दूँ तुम्हारी यादों को
जिस से दर्द में डूबा
सृजन तो बंद हो ,,,

आखिर जब मै समर्पित ही नहीं रहा
तुम्हारे एकान्त तुम्हारे मान के प्रति
तो ये खोखला सृजन क्यूँ
तुम्हारा नाम लेकर
तुम्हारे नाम के लिए
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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बुधवार, 22 जुलाई 2009

आ जाओ सँवरे......!!

पथ पखारू, रह निहारु



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







रह ताकत, अखियाँ पत्थराई



तुम्हारे लिये है, दुनिया बिसराई



सुन लो अरज सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







मैं हूँ तुम्हारी, तुझ में ही खोई



भूली हूँ सब कुछ, मेरा नही कोई



ले लो शरण सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







जब से है जाना, मैं हूँ तुम्हारी



भूली हूँ सब कुछ , मेरा दोष नही कोई



दर्शन दो सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







तुम्ही मेरा जीवन, तुम्ही मेरी साँसे



तुम्ही मेरी मुक्ति, तुम्ही मेरे सहारे



पार लगा दो सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







काम , क्रोध, लोभ, मोह , माया सब मुझ से जुडा है



श्रष्ठी का कैसा ये जाल बिछा है



कठपुतली से नाच रहे है



मुक्ति दो सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे



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मंगलवार, 21 जुलाई 2009

आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है......!!

ये बात है खुद से ही ....जिस के पास खुद के लिये कुछ नही है...,
शायद! वो खुद भी नही...

आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है ,
कल मैं पूरी थी तुम्हारी आज मन भी नही है।
अब तो बस, खाली मकान-सा खण्ङर बचा है ,
इसके विराने भी, गूंजते शोर से काम नही है ।
आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है॥
कांच का सा मन, फूल का सा तन,
धीरे-धीरे देख पत्थर बन गया है।
पत्थरो में जान तो है , अरमान नही है,
आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है॥
आज में कहती हूँ, मुझ से दूर हो जा,
अब तो तुझ में रहने की हिम्मत नही है।
आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है॥

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सोमवार, 20 जुलाई 2009

और कहीं अरमान धुल रहे थे


आदम कद दीवारों से घिरा आँगन
दो अल्हड जवानियों को
मिलाने लगा था,,
की साथ दिया तुने भी खुदा
हर बूँद के साथ
मिलन को सुहावना बना दिया
झमाझम करके बरसते बादलों से ,,
होंठ थरथरा उठे थे ,,
मिलन का नव विस्तार हो रहा था .

उन्ही दीवारों के बाहर
कोई और भी था
एक लड़का और हाथ में बच्ची
फटेहाल बेहाल , जाने किस हाल में
एक छत होती थी सर पे रोज
सूखे आसमान की ..
आज तुने वो भी छीन ले खुदा
बच्ची मरने की सी हालत में आ गई है
और लड़के के होंठ थरथरा उठे हैं
शायद पेट भूखा होने से ..
शायद ठण्ड ज्यादा है ,,
या शायद नवजात की बेबसी पर
..
बरसात तो की खुदा
मगर ये क्या हश्र हुआ
बरसात ने दो को मिलाया
दो को मिटाने जुट गई

बरसात में अरमान तो
दोनों तरफ थे
बस फर्क ये था मेरे खुदा
कहीं अरमान घुल रहे थे
और कहीं
अरमान धुल रहे थे
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

अब हम यहाँ रहें कि वहाँ रहें........!!

अपने आप में सिमट कर रहें
कि आपे से बाहर हो कर रहें !!
 
बड़े दिनों से सोच रहे हैं कि
हम अब यहाँ रहें या वहाँ रहें !!
 
दुनिया कोई दुश्मन तो नहीं
दुनिया को आख़िर क्या कहें !!
 
कुछ चट्टान हैं कुछ खाईयां
जीवन दरिया है बहते ही रहे !!
 
कुछ कहने की हसरत तो है
अब उसके मुंह पर क्या कहें !!
 
जो दिखायी तक भी नहीं देता
अल्ला की बाबत चुप ही रहें !!
 
बस इक मेहमां हैं हम "गाफिल "
इस धरती पे तमीज से ही रहें !!
 
कवि : राजीव जी की रचना

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मंगलवार, 14 जुलाई 2009

जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी !!

कब यहाँ से वहाँ.....कब कहाँ से कहाँ ,
कितनी आवारा है ये मेरी जिंदगी !!
कभी बनती सबा कभी बन जाती हवा ,
कितने रंगों भरी है मेरी ये जिंदगी !!
जिंदगी-जिंदगी -जिंदगी-जिंदगी !!
नाचती कूदती-चिडियों सी फूदती ,
चहचहाती-खिलखिलाती मेरी जिंदगी !!
जिंदगी -जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी !!
याद बनकर कभी,आह बनकर कभी ,
टिसटिसाती है अकसर मेरी जिंदगी !!
जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी !!
जन्म से मौत तक,खिलौनों से ख़ाक
तक
किस तरह बीत जाती है ये तन्हाँ जिंदगी !!
जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी !!


कवि : राजीव जी की रचना

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शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

मुश्किलें......!!

मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं...

जिनके हाथ इतने मजबूत हैं कि

तोड़ सकते हैं जो किसी भी गर्दन....!!

मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं...

जो कर रहे हैं हर वक्त-

किसी ना किसी का.....

या सबका ही जीना हराम....!!

मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं...

जिनके लिए जीवन एक खेल है...

किसी को मार डालना ......

उनके खेल का इक अटूट हिस्सा !!

मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं...

जो देश को कुछ भी नहीं समझते...

और देश का संविधान....

उनके पैरों की जूतियाँ....!!

मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं...

जो सब कुछ इस तरह गड़प कर रहे हैं...

जैसे सब कुछ उनके बाप का हो.....

और भारतमाता !!........

जैसे उनकी इक रखैल.....!!

मुश्किलें उनके साथ जीने में हैं...

जिनको बना दिया गया है...

इतना ज्यादा ताकतवर.....

कि वो उड़ा रहे हैं हर वक्त.....

आम आदमी की धज्जियाँ.....

और क़ानून का सरेआम मखौल.....!!

...........दरअसल ये मुश्किलें......

हम सबके ही साथ हैं.....

मगर मुश्किल यह है....

कि..............

हमें जिनके साथ जीने में.....

अत्यन्त मुश्किलें हैं.....

उनको.........

कोई मुश्किल ही नहीं......!!??
 
कवि : राजीव जी की रचना

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गुरुवार, 9 जुलाई 2009

इतना भी जुड़ ना जाए..

कभी धुप चिलचिलाये
कभी शाम गीत गाये....!!
जिसे अनसुना करूँ मैं
वही कान में समाये.....!!
उसमें है वो नजाकत
कितना वो खिलखिलाए !!
सरेआम ये कह रहा हूँ
मुझे कुछ नहीं है आए...!!
चाँद भी है अपनी जगह
तारे भी तो टिमटिमाये...!!
जिसे जाना मुझसे आगे
मुझपे वो चढ़ के जाए...!!
रहना नहीं है "गाफिल"
इतना भी जुड़ ना जाए...!!


कवि : राजीव जी की रचना

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मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कह दो उन से

कह दो उन से , उनका ख़याल आया था
क्यूँ नहीं है मेरी ये एक सवाल आया था

थमी हैं साँसें बेचैन है दिल , उनसे कहो
आँखों के सूखे समंदर में बवाल आया था ..
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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पर गम बता ये तमाम क्या है

वादों का जो हंसी सफ़र है बता ये कैसे मकाम का है
महकती सांसों में गम है मेरे बता ये कैसे इनाम का है

तुम्हे मुकम्मल जहाँ मिलेगा दुआ जो मेरी कुबूल होगी
हिज्र की रातों में सिकना मुझे है ये सितम कैसे मकाम का है

हुश्न की चादर तले तू कत्ल है और कातिल मेरी भी तू है
मै हश्र का दिन हूँ तेरे लिए तू बता की तेरा पैगाम क्या है

मैंने लिख दिए हैं हजार ख़त ये नज्म तुझ पे निसार हो
मुझे मौत होगी नसीब जो कह की तेरा पयाम क्या है

तुझे शुबह की हो रंगीनिया तुझे शब् में कोई नसीब हो
मुझे बता की मेरा नसीब क्या है मेरी बिलखती शाम क्या है

तुम्हे सारी खुशियाँ मिले यहाँ तुम्हें गम का साया न मिले
मुझे तेरी यादें कबूल हैं पर गम बता ये तमाम क्या है ........

कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

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मंगलवार, 30 जून 2009

आज फिर अन्तर्मन हुआ उद्धेलित

आज फिर मन हुआ उद्धेलित
मन सशंकित, क्या पाउँगा

निरा लड़कपन, दौड़ जवानी,
सुस्ताया बुढापा, ख़तम कहानी

ये कौन है
जो दॉव नित नई चल रहा है

परदे के पीछे से
नित नई तानाँ- बानाँ बुन रहा है

कह गए वो सारथि बन कर बहुत कुछ,
बो बहुत कुछ क्यों फिसलता जा रहा है

क्यों सशंकित मन हुआ है,
क्या कोई फिर से दावँ नई चल रहा है

धार में - मजधार में हूँ ,
हूँ किनारे से अपरिचित

है भरोशा बो बहुत कुछ,
सारथी बन देगा किनारा

फिर भी न जाने,
क्यों सशंकित मन हुआ है,
बावला बन, क्यों भटकता फिर रहा है

भर्मित क्यों हो रहा उससे,
जिसका होना ही भ्रम है

कह गए शंकर की, अद्वेत है सब,
रूप - रेखा सब यहाँ बस एक भ्रम है

पेट भी और भूख भी क्या एक भ्रम है ?
शाश्वत तो यहाँ केवल एक ब्रहम है ....

सुन कर ही इसे मै पान कर लूं ,
या फिर चिंतन - मनन और ध्यान कर लूं

है अबूझ ये बुझ न पाऊँ,
इसलिए ये मन सशंकित हुआ है

फिर कभी उलझुंगा इससे,
फिर कभी निपटूंगा इससे


कवि: कुंवरजी की रचना

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गुरुवार, 25 जून 2009

जो छूट गई है दुनिया में



जो छूट गई है दुनिया में,, मेरी ही कुछ हस्ती थी
साहिल छोर के दरिया डूबी , मजबूत बड़ी वो कश्ती थी

उनका घर तो रौशन था पर डर था सबके चेहरे पर
एक उनके घर में रौनक थी और जलती सारी बस्ती थी

कुछ जिन्दा और मुर्दा लड़ते अल्लाह ईश के नाम पर
खामोशी मजबूरी थी कुछ जान यहाँ पर सस्ती थी

तूफानों को रंज बहुत था और चरागाँ जलते थे
कुछ अरमानो की दुनिया थी कुछ मौत यहाँ पर हस्ती थी

दिल लाख छुपाओ ताले में कोई चोर चुरा ले जायेगा
हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,
 
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी''  जी की रचना 

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शनिवार, 20 जून 2009

मै तुम्हारी परछाई तो हूँ ,,,


मेरे हाथ में तुम्हारा हाथ नहीं
पर धुप में तुम्हारी परछाई तो हूँ

मै कभी तुम्हारे साथ नहीं
पर अनदेखी तन्हाई तो हूँ

मै वफ़ा नहीं हूँ प्यार नहीं
कुछ ना सही हरजाई तो हूँ

मै आगाज़ नहीं अंजाम नहीं
रोती आँखों की रुसवाई तो हूँ

तुम हो निरा अकेली दुनिया में
पर मै तुम्हारी परछाई तो हूँ ,,,
 
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी''  जी की रचना 

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शनिवार, 13 जून 2009

तुम कहो तो

कुछ बंद ज़ुबां से
कुछ गुस्ताख निगा-ह से
कुछ मटकती आँखों से
कुछ भटकती साँसों से
कुछ चूडियों की खन खन से
कुछ पायलों की छम छम से
कुछ आँचल को लहराकर
कुछ जुल्फों को बिखराकर
कुछ आवेश में आकर भी
कुछ शरमाकर
कुछ मुझे बाँहों में लेकर
कुछ मेरी बाहों में आकर

कुछ प्यार भरा एक नगमा
तुम कहो तो
तुमसे अनुनय है ये
की तुम कुछ कहो तो
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी''  जी की रचना 
 

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बुधवार, 10 जून 2009

यही सत्य है न इसे भूल जाना.........

कैसे बताएं कितनी सुहानी
होती है ये जीवन की कहानी ।।      
कोमल मनोहर परियो  की रानी
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ।।

ये छोटा सा तन जब होता मात्र एक अंश है……..
बस माता ही उसका करती पोषण है
बनता है बढ़ता , आकार धरता …….
दुनिया से पहले माता से जुड़ता ।।
माता ही धड़कन माता ही बोली ……
उसी के संग करता है कितनी ठिठोली
लेता  जन्म है , इस लोह्खंड सी दुनिया में रखता कदम है
बिना जाने समझे , की दुनिया की फितरत बड़ी वेरहम है  ।।

रोते बिलकते चले आते हो  तुम…..
जैसे किसी ने तुम पर ढाया   सितम है ।।
फिर नन्ही-नन्ही आँखों से संसार देखा ……
कुछ मस्ती भी की ……और ढेर  सारा रोया । 

नन्हे - नन्हे कदमो से नाप ली ये दुनिया ……
कहलाई सब की दुलारी सी गुडिया ।।
अपनी तोतली बोली से हर लिया सब का मन…..
घर बन गया खुशियो का उपवन …. ।।
कैसा मनोहर , ठुमकता, मटकता , किलकारी भरता……
होता है बचपन सब से अनोखा  ।।

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............
कितना कष्टकारी होता है वो दिन
जब माँ के बिना तडपता है ये दिल।।
उसे छोड़ कर स्कूल जाना
और नई दुनिया में अपनी हस्ती जमाना ।।
कॉपी-कितवो से खुद को बचना
और फिर नए दोस्तों में एक दुनिया बसाना।।
गुरु की कृपा से जीवन के अनमोल ज्ञान को पाना
कभी  डांट कर , कभी दुलार कर हमको पढ़ना।। 

बहुत याद आता है उनका चश्मा पुराना
हाथो में छड़ी  , और मन में करूणा छुपना ।।
वो यारो  संग मस्ती , हमेशा साथ खाना  
वो मिलना मिलना , वो हसना हसाना  ।।

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............

जीवन की इतनी अवस्थायें पार  कर के ….
जवानी की खूबसूरत दहलीज पर आना ।।
मन में उमंगें ...... लवो पर तराने ……
कितने ही किस्से............ नए और पुराने ।।
फिर मोड़ आता है ऐसा सुहाना।
जब मन हो जाता है किसी का दीवाना ।।
उसी के सपने , उसी की बातें , उसी की यादें
हमेशा उसे याद रखना और खुद को भी भूल जाना ।।
उसी की तस्वीर मन में सजाना ……….

और उसे पाने को कुछ भी कर गुज़र जाना ।।

फिर भरी आंख लेकर ससुराल जाना 
नये सारे रिश्ते नये सारे नाते  निभाना ।।
उन सब से अपना तालमेल बिठाना 
घर,परिवार , नाते , रिश्तो का एक दम से बदल जाना  ।।
जिम्मेदारी उठाना , वो घर का चलाना 

घड़ी भर को भी फुरसत न पाना ।। 
माँ , भाभी , मामी , बुआ , चाची और बहु जैसे ….
उपनाम पाना और खुद का ही नाम कहीं धुधला पड़ जाना  ।।  

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............

फिर आ जाता  है जीवन का अंतिम ठिकाना 
जिसे आज तक किसीने न चाहा ।।
अकेला बुढ़ापा , जिसे कभी छोड कर न जाना। 
ये ऐसा शाखा है जो अंत तक है रिश्ता निभाता।।
बाँकी सभी को है पीछे छूट जाना 
यही वो अवस्था जिसने सब कुछ नश्वर बनाया ।।
छणभंगुर है सब कुछ हमको सिखाया 
एक हिलती सी कुर्सी , एक हिलती सी लाठी  ।।
एक अकेला सा कमरा , जहाँ नही कोई अपना। 
झूकी सी कमर और चहरे पर झुरियो की कहानी।। 
पल पल सिसकना , फिर भी मुस्करना।

बुझते दियो में सपने सजाना।।

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............

फिर आ जाता है आपनो का बुलावा  
और पीछे छूट जाता है सारा जमाना ।।
पल भर में ही सब नश्वर हो जाता 
न रिश्ता, न नाता , न जवानी , न बुढ़ापा।। 
बस! उस शून्य से आकर उसी में समा जाना 
रोता रहता है पीछे संसार सारा।। 
पर तेरा तो तेरे शून्य में ही ठिकाना 
उसी से बना फिर उसी में मिल जाना।। 
इस रंगमंच को छोड कर उस ईश्वर में समा जाना। 
पञ्च तत्वो की इस देह का मिट्टी में मिल जाना  ।।
और आत्मा -परमात्मा का मिलना मिलाना
जिस के थे अंश उसी में मिल जाना ।।
बस उसी अंश का चक्कर चलते है जाना 

यही सत्य है न इसे भूल जाना

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी ............ .

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