संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

सच कहता हूँ


सच कहता हूँ
प्रेम निश्वार्थ था तुमसे मुझे
पर तुम्हारे जाने का दर्द
सृजन का माध्यम बन गया ,,,

मै रह ही नहीं पाया
समर्पित
प्रेम के कलरव एकांत के प्रति
न नव सुरम्य जीवन साध्य के प्रति
हर लम्हे को उतारा है मैंने
शब्दों से दिल के बाहर भी
नयन सुख से मिलन की हर बेला तक
मैंने समर्पण को समर्पित कर दिया है ,,

पर अभी भी एक रिश्ता है तुम्हारा
मेरे सृजन से
दर्द ,, दोनों में है ,,,,

तो सोचता हूँ
त्याग दूँ तुम्हारी यादों को
जिस से दर्द में डूबा
सृजन तो बंद हो ,,,

आखिर जब मै समर्पित ही नहीं रहा
तुम्हारे एकान्त तुम्हारे मान के प्रति
तो ये खोखला सृजन क्यूँ
तुम्हारा नाम लेकर
तुम्हारे नाम के लिए
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

11 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 23 जुलाई 2009 को 3:52 pm  

अजीत जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

AlbelaKhatri.com 23 जुलाई 2009 को 5:15 pm  

waah.............
kya khoob kavita
bahut khoob kavita
badhaai 1

M VERMA 23 जुलाई 2009 को 5:28 pm  

सुन्दर अभिव्यक्ति -- सशक्त भाव

nidhitrivedi28 23 जुलाई 2009 को 6:15 pm  

yun lagata hai jo kuchh mere andar chal raha tha, jo kuchh main kahan chah rahi thi, aapane sab kah diya. Mujhe mere hi man ka hl jan padata hai is kavita me.

‘नज़र’ 23 जुलाई 2009 को 7:23 pm  

प्रशंसनीय रचना

संगीता पुरी 23 जुलाई 2009 को 10:07 pm  

सुंदर भाव .. अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

शरद कोकास 23 जुलाई 2009 को 11:22 pm  

प्रस्तुतकर्ता गार्गी गुप्ता को इस प्रस्तुति के लिये बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 24 जुलाई 2009 को 8:14 am  

भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए,
आभार!

ajitji 28 जुलाई 2009 को 7:45 pm  

dhanyawaad aap sabhi ko
aapki sarahana aur prtsahan srijan ke marg par sada hi mera margdarshan karega,,,,,,,,,

gargi ji
is rachana ko yahan rakhne ke liye
mai hriday se aapka aabhari hun
aise hi sneh banaaye rakhen

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