संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

पर गम बता ये तमाम क्या है

वादों का जो हंसी सफ़र है बता ये कैसे मकाम का है
महकती सांसों में गम है मेरे बता ये कैसे इनाम का है

तुम्हे मुकम्मल जहाँ मिलेगा दुआ जो मेरी कुबूल होगी
हिज्र की रातों में सिकना मुझे है ये सितम कैसे मकाम का है

हुश्न की चादर तले तू कत्ल है और कातिल मेरी भी तू है
मै हश्र का दिन हूँ तेरे लिए तू बता की तेरा पैगाम क्या है

मैंने लिख दिए हैं हजार ख़त ये नज्म तुझ पे निसार हो
मुझे मौत होगी नसीब जो कह की तेरा पयाम क्या है

तुझे शुबह की हो रंगीनिया तुझे शब् में कोई नसीब हो
मुझे बता की मेरा नसीब क्या है मेरी बिलखती शाम क्या है

तुम्हे सारी खुशियाँ मिले यहाँ तुम्हें गम का साया न मिले
मुझे तेरी यादें कबूल हैं पर गम बता ये तमाम क्या है ........

कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

8 टिप्पणियाँ:

नीरज गोस्वामी 7 जुलाई 2009 को 12:15 pm  

मैंने लिख दिए हैं हजार ख़त ये नज्म तुझ पे निसार हो
मुझे मौत होगी नसीब जो कह की तेरा पयाम क्या है

बहुत अच्छी रचना है...बधाई...
नीरज

ओम आर्य 7 जुलाई 2009 को 1:21 pm  

वादों का जो हंसी सफ़र है बता ये कैसे मकाम का है
महकती सांसों में गम है मेरे बता ये कैसे इनाम का है

.........अतिसुन्दर भाई

‘नज़र’ 7 जुलाई 2009 को 2:33 pm  

अत्यन्त सुन्दर रचना है

---
गुलाबी कोंपलें

Udan Tashtari 7 जुलाई 2009 को 6:18 pm  

आभार इस सुन्दर रचना को पढ़वाने का.

अनिल पाण्डेय 7 जुलाई 2009 को 7:01 pm  

bahut shukriya....is tarah ki rachnayein dil ko sukun deti hain.

alfaz 8 जुलाई 2009 को 10:27 am  

मैंने लिख दिए हैं हजार ख़त ये नज्म तुझ पे निसार हो
मुझे मौत होगी नसीब जो कह की तेरा पयाम क्या है
बहुत सुन्दर रचना है , बधाई.

ajitji 9 जुलाई 2009 को 12:03 pm  

dhanyawaad,,,,,,,,, aap sabhi ko protsahan aur sneh ke liye

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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