संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

बुधवार, 22 जुलाई 2009

आ जाओ सँवरे......!!

पथ पखारू, रह निहारु



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







रह ताकत, अखियाँ पत्थराई



तुम्हारे लिये है, दुनिया बिसराई



सुन लो अरज सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







मैं हूँ तुम्हारी, तुझ में ही खोई



भूली हूँ सब कुछ, मेरा नही कोई



ले लो शरण सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







जब से है जाना, मैं हूँ तुम्हारी



भूली हूँ सब कुछ , मेरा दोष नही कोई



दर्शन दो सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







तुम्ही मेरा जीवन, तुम्ही मेरी साँसे



तुम्ही मेरी मुक्ति, तुम्ही मेरे सहारे



पार लगा दो सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे







काम , क्रोध, लोभ, मोह , माया सब मुझ से जुडा है



श्रष्ठी का कैसा ये जाल बिछा है



कठपुतली से नाच रहे है



मुक्ति दो सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे



आ जाओ सँवरे........जी आ जाओ सँवरे



11 टिप्पणियाँ:

विनोद कुमार पांडेय 25 जुलाई 2009 को 10:27 am  

aa jao sawere..
sundar abhivyakti..
badhiya rachana...badhayi!!!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" 25 जुलाई 2009 को 2:10 pm  

very nicely written gargi ji...
congrats, keep writing good...

http://shayarichawla.blogspot.com/

ओम आर्य 25 जुलाई 2009 को 2:47 pm  

bahut hi man bhaawan our khubsoorat rachana ......badhaaee

M VERMA 25 जुलाई 2009 को 5:34 pm  

बहुत सुन्दर

dr. ashok priyaranjan 26 जुलाई 2009 को 12:20 am  

बहुत अच्छा लिखा है आपने-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) 27 जुलाई 2009 को 4:12 pm  

gargi ji aap ki kavita ki vishesta hai ki shabd jitne saral hote hai bhav utne hi gahan ,,, aatma ki ukchaht aur tadap ko , tha bandhno se chhutne ki tatparta ko aap ne likha hai mujhe isme samarpan ki parakastha bhi dikhti hai ,,,aap ne purn rup se apne aap ko nirih jaan saabre me ragne ka bhut hi acvhha pryash kiya hai aur aap safal bhu hui bhagwaan shri krishan ne geet me kaha hai "sarv dharm parityajy ma mekam sarnam agachh "arthat sabhi dharmo ko chood meri srn me aa jao ye kavita usi bhab ko sarthak karti hai
ab truti shbdo ki gramer me thori prob hai meri bhi rahti hai magar khna jaruru hai sudhaar kar prstut kare
rah ,, raah
sabre ,,,,, saabre
srthi ,,,,,,sharsti
aadi
meri badhayi swikaar kare
saadar
praveen pathik
9971969084

ajitji 28 जुलाई 2009 को 7:46 pm  

gargi ji
saral shabdon me bahate huye
gahan aur sundar bhav
, ek sundar rachana ke liye badhaai sweekaren

भूतनाथ 1 अगस्त 2009 को 8:38 am  

अभी तो मैं इस प्रार्थना में डूबा हुआ हूँ....उबरते ही कुछ बोलूँगा....तब तक के लिए विदा(ब्रेक)

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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