संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कह दो उन से

कह दो उन से , उनका ख़याल आया था
क्यूँ नहीं है मेरी ये एक सवाल आया था

थमी हैं साँसें बेचैन है दिल , उनसे कहो
आँखों के सूखे समंदर में बवाल आया था ..
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

13 टिप्पणियाँ:

MANVINDER BHIMBER 8 जुलाई 2009 को 11:06 am  

शायद जिन्दगी किसी नई परिभाषा से परिभाषित हैं। कविता हमारे रोज-मर्रा में होने वाले छोटे-छोटे हादसो की ओर इंगित कर रही है जो, कि जख्मों की गांठ खोल तो देते है फिर उन्हें भरने के लिये लंबा इंतजार करना पड़ता है।

अनिल कान्त : 8 जुलाई 2009 को 11:09 am  

ये एक अच्छी बात है की लोग कम से कम कविता से अपना दर्द बयाँ तो कर लेते हैं

RAJIV MAHESHWARI 8 जुलाई 2009 को 12:02 pm  

हार्दिक शुभ कामनाएं !
अच्छा है अंदाज़े-बयाँ।
सुस्वागतम्।

विनोद कुमार पांडेय 8 जुलाई 2009 को 1:43 pm  

aapki prem abhivyakti se paripurn layine bahut achchi lagi..

badhayi...

ओम आर्य 8 जुलाई 2009 को 2:47 pm  

भावानाओ का तुफान खडा कर दिये हो छोटी सी रचना मे ..........अतिसुन्दर ...........बधाई

alfaz 8 जुलाई 2009 को 3:34 pm  

एक छोटी सी रचना में सारा दर्द सिमट गया ,
काबिल इ तारीफ . बधाई.

ajitji 9 जुलाई 2009 को 12:06 pm  

aap sabhi ke sneh aur protsahan ke liye bahut bahut sukriya

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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