संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मन चंचल गगन पखेरू है,

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,
की किससे चाह है मुझको.
वो बस हालात ऐसे थे,
कि बुरा मैं बन नहीं पाया.
मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,
कोई समझाए तो इसको.
ज़माने की हवा है ये,
ये रूहानी नहीं साया.
मगर ताबीज़ ला दो तुम,
तसल्ली गर मिले तुमको.
उसे लम्हे डराते हैं,
कल की गम की रातों के,
है सूरज हर घड़ी देता,
ख़ुशी की रौशनी जिसको.
  
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

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बुधवार, 23 सितंबर 2009

हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,

 
 
जो छूट गई है दुनिया में,, मेरी ही कुछ हस्ती थी
साहिल छोर के दरिया डूबी , मजबूत बड़ी वो कश्ती थी

उनका घर तो रौशन था पर डर था सबके चेहरे पर
एक उनके घर में रौनक थी और जलती सारी बस्ती थी

कुछ जिन्दा और मुर्दा लड़ते अल्लाह ईश के नाम पर
खामोशी मजबूरी थी कुछ जान यहाँ पर सस्ती थी

तूफानों को रंज बहुत था और चरागाँ जलते थे
कुछ अरमानो की दुनिया थी कुछ मौत यहाँ पर हस्ती थी

दिल लाख छुपाओ ताले में कोई चोर चुरा ले जायेगा
हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,
 
 
''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना
 

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मंगलवार, 15 सितंबर 2009

सो जा ......

सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
तेरी चंदा जैसी माता
तेरे पिता है विधाता
और तू है सब की आँखों का तारा
सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
तेरे नन्ही नन्ही आंखे
इनमें सपने कितने सरे
इन सपनो में कही तू खो जा
सो जा ......सो जा ......हो सो जा
राजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......
ला ला .....हम्म ....ला ला ......ला ला .....हम्म ....ला ला
ला ला .....हम्म ....ला ला .....ला ला .....हम्म ....ला ला

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शनिवार, 12 सितंबर 2009

फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,
तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .
उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,
क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.
तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे,
अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.
माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे.
फिर रोटियों के चोर कितने, भूखे पीटे जायेंगे,
फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना


 

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

शामिल है.

लहू पहाड़ के दिल का, नदी में शामिल है,
तुम्हारा दर्द हमारी ख़ुशी में शामिल है.
तुम अपना दर्द अलग से दिखा न पाओगे,
तेरा जो दर्द है वो मुझी में शामिल है.

गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,
जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.
दूर कितनी भी रहूँ, खोलोगे जब भी आँख तुम,
मैं सिरहाने पर तुम्हारे जागती मिल जाऊँगी.
घर के बाहर जब कदम रखोगे अपना एक भी,
बनके मैं तुमको तुम्हारा रास्ता मिल जाऊँगी.
मुझपे मौसम कोई भी गुज़रे ज़रा भी डर नहीं,
खुश्क टहनी पर भी तुमको मैं हरी मिल जाऊँगी.
तुम ख्यालों में सही आवाज़ देके देखना,
घर के बाहर मैं तुम्हें आती हुई मिल जाऊँगी.
गर तसब्बुर भी मेरे इक शेर का तुमने किया,
सुबह घर कि दीवारों पर तुम्हें लिखी हुई मिल जाऊँगी।

कवि : 'बीती ख़ुशी' जी की रचना

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बुधवार, 9 सितंबर 2009

मैं तेरे साथ - साथ हूँ।।

देखो तो एक सवाल हूँ
समझो तो , मैं ही जवाब हूँ ।।

उलझी हुई,इस ज़िन्दगी में।
सुलझा हुआ-सा तार हूँ।।

बैठे है दूर तुमसे , गम करो
मैं ही तो बस, तेरे पास हूँ।।

जज्वात के समन्दर में दुबे है।
पर मैं ही , उगता हुआ आफ़ताब हूँ

रोशनी से भर गया सारा समा
पर मैं तो, खुद ही में जलता हुआ चिराग हूँ ।।

जैसे भी ज़िन्दगी है, दुश्मन तो नही है।
तन्हा-सी हूँ मगर, मैं इसकी सच्ची यार हूँ।।

जलते हुए जज्वात , आंखो से बुझेंगे
बुझ कर भी बुझी, मैं ऐसी आग हूँ।।

कैसे तुम्हे बता दें , तू ज़िन्दगी है मेरी
अच्छी या बुरी जैसे भी, मैं घर की लाज हूँ ।।

कुछ रंग तो दिखाएगी , जो चल रहा है अब।
खामोशी के लबो पर छिड़ा , में वक्त का मीठा राग हूँ।।

कलकल-सी वह चली, पर्वत को तोड़ कर
मैं कैसे भूल जाऊ, मैं बस तेरा प्यार हूँ।।

भुजंग जैसे लिपटे है , चंदन के पेड़ पर
मजबूरियों में लिपटा हुआ , तेरा ख्बाव हूँ।।

चुप हूँ मगर , में कोई पत्थर तो नही हूँ।
जो तुम कह सके, मैं वो ही बात हूँ

बस भी कर, के तू मुझको याद
वह सकेगा जो, में ऐसा आव हूँ।।

मेहदी बारातै सिन्दूर चाहिए
मान लिया हमने जब तुम ने कह दिया , मैं तेरा सुहाग हूँ।।

खुद को समझना, कभी तन्हा और अकेला।
ज़िन्दगी के हर कदम पर , मैं तेरे साथ - साथ हूँ।।

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मंगलवार, 8 सितंबर 2009

मन किया

आज न जाने क्यूँ रोने को मन किया।
माँ के आंचल में सर छुपा के सोने को मन किया।
दुनिया की इस भाग दौड़ में,खो चुका था रिश्तेय सब।
आज फिर उन रिश्तो को इक सिरे से संजोने का मन किया।
दिल तोद्ता हूँ सब का अपनी बातों से,
लड़ने का मन भी तो आपनो के मन से किया।
ता उमर जिसे भुला नही सकते ,
आज उणोह्ने हमें भुलाने का मन किया।
शिकवा भी तो आपनो से होती है,
क्या हुआ जो उन्हे ग़म देने का मन किया।

कवि : गुरशरण जी की रचना

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सोमवार, 7 सितंबर 2009

मेरी बेबसी देखिये

बना डाला खुदा उफ़ ये बंदगी देखिये
अकीदते-बाज़ार मे खडा आदमी देखिये

समंदर भी लगने लगा है दरिया मुझे
भड़की है एक कदर तिशनगी देखिये

हर बार आईने मे शक्ल नयी सी दिखे
कितने हिस्से मे बट गयी जिंदगी देखिये

रो देते है तन्हाई मे खुद से बाते कर"मीत"
गर मिले फ़ुर्सत तो मेरी बेबसी देखिये

कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

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शनिवार, 5 सितंबर 2009

आपको मेरा नमन है.....!!!

यह कविता में अपने गुरुओ के लिये लिख रही हूँ , आज में जो कुछ भी हूँ बस उनकी ही कॄपा है। ईश्वर से प्रार्थना है की उनका हाथ सदा मेरे सर पर रहे।



मैं थी शिशु
अज्ञान - अबोध - अचेतन
सभी से अन्भिज्ञा थी मैं
उसने अपनों से परिचित कराया
जीवन की पाठशाला का
उसी से पहला पाठ पाया
प्रथम गुरु !! सर्वोच्च माता को मेरा नमन है ।

पशुतव से जो मनात्तव तक ले आये
आप ज्ञान के दर्पण हो
आपको मेरा नमन है ।

अपने ही भावो को व्यक्त करना सिखाया
आप शब्द दाता है
आपको मेरा नमन है ।

अज्ञान के तिमिर को हर कर
जो ज्ञान दीप आपने जलाये
आपको मेरा नामन है ।

आप स्वयं जले "पर" की खातिर
जीवन में ज्ञान के जुगनू जलाये
आपको मेरा नामन है ।

आप मेरे जीवन में मेरूदंड बन कर खड़े है
हर क्षण मुझे रास्ता दिखाये, आप वो दिये हो
आपको मेरा नामन है।

आप बिन जीवन कैसा जीवन
कल्पना करना कठिन है
कल्पना करना सिखाया
आपको मेरा नमन है ।

अंधेरी ज़िन्दगी में
ज्ञान की किरणे बिखेरी
कभी प्यार कभी फटकार से
जीवन की बगिया सहेजी
आप बागवान हो
आप को मेरा नामन है।

जहाँ भी हुआ अंधेरा
आप बन कर प्रभात आये
अपने साथ अक्षय ज्ञान रत्नो की सौगात लाये
क्या है ये संसार हम जान पाये
आपको मेरा नमन है।

मेरे जीवन में सदा
आप का दर्जा प्रथम है
ईश्वर के उस अंश को
मेरा नमन
शत-शत नमन है .....!!

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गुरुवार, 3 सितंबर 2009

कुछ दिलजलों को

उतरने लगा है
नाकाम मोहब्बत का नशा
जिन्दगी जीने की जद-ओ-जहद
फिर आडे आ रही
यादों का बोझ उठाने में

बड़ा हूँ तो
बोझ भी उठाना है घर का

तो तुम्हे याद करने का
एक नायब तरीका ढूंड निकाला है
जिस से रोजी भी चलती रहती है

बस यूँ करता हूँ की
रोज कमाई की खातिर
तुम्हारी एक याद को
एक कागज पर लिखकर
बेच देता हूँ
कुछ दिलजलों को
 
कवि: अजीत त्रिपाठी जी की रचना

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बुधवार, 2 सितंबर 2009

है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.

क्या खूब पायी थी उसने अदा।
ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह॥


कतरे गए कई परिंदों के पर।
सबको खेला था वो बाजियों की तरह॥


हौसला नाम से रब के देता रहा।
फैसला कर गया काजिओं की तरह


ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर।
करके छोडा हमें हाशिओं की तरह


साहिलों को मिलाने की जुंबिश तो थी।
खुद का साहिल था माझिओं की तरह


जिनको दिल से लगा 'मशाल' शायर बना।
है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह॥



कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना

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मंगलवार, 1 सितंबर 2009

पूछता रहता है क्या

ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,
ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.
जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश करना क्या,
इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.
खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,
गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है क्या.
कोई मंतर नहीं ऐसा, जो आदमियत जिला सके,
कान में इस मुर्दे के, तू फूंकता रहता है क्या.
आएँगी कहाँ वो खुशबुएँ, अब इनमें 'मशाल',
दरारों में दरके रिश्तों की, सूंघता रहता है क्या.

कवि : दीपक 'मशाल' जी की रचना

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