संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

मन चंचल गगन पखेरू है,

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,
की किससे चाह है मुझको.
वो बस हालात ऐसे थे,
कि बुरा मैं बन नहीं पाया.
मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,
कोई समझाए तो इसको.
ज़माने की हवा है ये,
ये रूहानी नहीं साया.
मगर ताबीज़ ला दो तुम,
तसल्ली गर मिले तुमको.
उसे लम्हे डराते हैं,
कल की गम की रातों के,
है सूरज हर घड़ी देता,
ख़ुशी की रौशनी जिसको.
  
कवि: दीपक 'मशाल' जी की रचना

7 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 24 सितंबर 2009 को 6:46 pm  

दीपक 'मशाल' जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

भूतनाथ 25 सितंबर 2009 को 1:09 am  

अरे गज़ब.....ये तो अत्यंत गहरी रचना है.... एकदम मशाल सी.......!!

Dipak 'Mashal' 25 सितंबर 2009 को 1:21 am  

thanks Gargi ji,
it's a b'day gift to me. :)

Pankaj Mishra 25 सितंबर 2009 को 10:06 am  

मन चंचल गगन पखेरू है,

सही बात है

वन्दना 25 सितंबर 2009 को 2:41 pm  

मन चंचल गगन पखेरू है,
मैं किससे बाँधता किसको.
kya shabd hain...........behtreen.

alfaz 30 सितंबर 2009 को 6:01 pm  

Kabil- E - Tarif Rachna....ek azadi ka ehsaas jhalakta hain panktiyon mein....

Vijay Kumar Sappatti 9 अक्तूबर 2009 को 10:16 am  

deepak ji

nazm padhkar man trupt ho gaya bhai ...

kudos

meri badhai sweekar kare .

regards,

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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