संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शनिवार, 12 सितंबर 2009

फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,
तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .
उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,
क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.
तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे,
अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.
माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे.
फिर रोटियों के चोर कितने, भूखे पीटे जायेंगे,
फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना


 

7 टिप्पणियाँ:

gargi gupta 12 सितंबर 2009 को 3:39 pm  

दीपक 'मशाल' जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

हिमांशु । Himanshu 12 सितंबर 2009 को 4:12 pm  

दीपक जी की इस रचना का आभार ।

"माँ जिसे कहते हैं वो, खेत बेचे जायेंगे,
मजबूरियों से तन कई, बाज़ार में आ जायेंगे."
पंक्तियों ने लुभाया ।

pankaj vyas 12 सितंबर 2009 को 4:30 pm  

esa hi chalta raha to bhavishya me कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे.
bhavishya ka katoo sacha... bayan kiya hai aapne

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 13 सितंबर 2009 को 7:11 am  

कवि: दीपक "मशाल" जी की रचना पढ़वाने के लिए आभार!

Pankaj Mishra 14 सितंबर 2009 को 2:02 pm  

दीपक जी की इस रचना का आभार ।

alfaz 15 सितंबर 2009 को 5:05 pm  

BEHTRIN RACHNA.
BAHUT UMDA LIKHA HAIN APNE.
LIKHTE RAHIYE.

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