संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

बुधवार, 10 जून 2009

यही सत्य है न इसे भूल जाना.........

कैसे बताएं कितनी सुहानी
होती है ये जीवन की कहानी ।।      
कोमल मनोहर परियो  की रानी
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ।।

ये छोटा सा तन जब होता मात्र एक अंश है……..
बस माता ही उसका करती पोषण है
बनता है बढ़ता , आकार धरता …….
दुनिया से पहले माता से जुड़ता ।।
माता ही धड़कन माता ही बोली ……
उसी के संग करता है कितनी ठिठोली
लेता  जन्म है , इस लोह्खंड सी दुनिया में रखता कदम है
बिना जाने समझे , की दुनिया की फितरत बड़ी वेरहम है  ।।

रोते बिलकते चले आते हो  तुम…..
जैसे किसी ने तुम पर ढाया   सितम है ।।
फिर नन्ही-नन्ही आँखों से संसार देखा ……
कुछ मस्ती भी की ……और ढेर  सारा रोया । 

नन्हे - नन्हे कदमो से नाप ली ये दुनिया ……
कहलाई सब की दुलारी सी गुडिया ।।
अपनी तोतली बोली से हर लिया सब का मन…..
घर बन गया खुशियो का उपवन …. ।।
कैसा मनोहर , ठुमकता, मटकता , किलकारी भरता……
होता है बचपन सब से अनोखा  ।।

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............
कितना कष्टकारी होता है वो दिन
जब माँ के बिना तडपता है ये दिल।।
उसे छोड़ कर स्कूल जाना
और नई दुनिया में अपनी हस्ती जमाना ।।
कॉपी-कितवो से खुद को बचना
और फिर नए दोस्तों में एक दुनिया बसाना।।
गुरु की कृपा से जीवन के अनमोल ज्ञान को पाना
कभी  डांट कर , कभी दुलार कर हमको पढ़ना।। 

बहुत याद आता है उनका चश्मा पुराना
हाथो में छड़ी  , और मन में करूणा छुपना ।।
वो यारो  संग मस्ती , हमेशा साथ खाना  
वो मिलना मिलना , वो हसना हसाना  ।।

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............

जीवन की इतनी अवस्थायें पार  कर के ….
जवानी की खूबसूरत दहलीज पर आना ।।
मन में उमंगें ...... लवो पर तराने ……
कितने ही किस्से............ नए और पुराने ।।
फिर मोड़ आता है ऐसा सुहाना।
जब मन हो जाता है किसी का दीवाना ।।
उसी के सपने , उसी की बातें , उसी की यादें
हमेशा उसे याद रखना और खुद को भी भूल जाना ।।
उसी की तस्वीर मन में सजाना ……….

और उसे पाने को कुछ भी कर गुज़र जाना ।।

फिर भरी आंख लेकर ससुराल जाना 
नये सारे रिश्ते नये सारे नाते  निभाना ।।
उन सब से अपना तालमेल बिठाना 
घर,परिवार , नाते , रिश्तो का एक दम से बदल जाना  ।।
जिम्मेदारी उठाना , वो घर का चलाना 

घड़ी भर को भी फुरसत न पाना ।। 
माँ , भाभी , मामी , बुआ , चाची और बहु जैसे ….
उपनाम पाना और खुद का ही नाम कहीं धुधला पड़ जाना  ।।  

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............

फिर आ जाता  है जीवन का अंतिम ठिकाना 
जिसे आज तक किसीने न चाहा ।।
अकेला बुढ़ापा , जिसे कभी छोड कर न जाना। 
ये ऐसा शाखा है जो अंत तक है रिश्ता निभाता।।
बाँकी सभी को है पीछे छूट जाना 
यही वो अवस्था जिसने सब कुछ नश्वर बनाया ।।
छणभंगुर है सब कुछ हमको सिखाया 
एक हिलती सी कुर्सी , एक हिलती सी लाठी  ।।
एक अकेला सा कमरा , जहाँ नही कोई अपना। 
झूकी सी कमर और चहरे पर झुरियो की कहानी।। 
पल पल सिसकना , फिर भी मुस्करना।

बुझते दियो में सपने सजाना।।

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी .............

फिर आ जाता है आपनो का बुलावा  
और पीछे छूट जाता है सारा जमाना ।।
पल भर में ही सब नश्वर हो जाता 
न रिश्ता, न नाता , न जवानी , न बुढ़ापा।। 
बस! उस शून्य से आकर उसी में समा जाना 
रोता रहता है पीछे संसार सारा।। 
पर तेरा तो तेरे शून्य में ही ठिकाना 
उसी से बना फिर उसी में मिल जाना।। 
इस रंगमंच को छोड कर उस ईश्वर में समा जाना। 
पञ्च तत्वो की इस देह का मिट्टी में मिल जाना  ।।
और आत्मा -परमात्मा का मिलना मिलाना
जिस के थे अंश उसी में मिल जाना ।।
बस उसी अंश का चक्कर चलते है जाना 

यही सत्य है न इसे भूल जाना

कोमल मनोहर परियो की रानी ..............
काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........

कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी ............ .

16 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा 10 जून 2009 को 5:49 pm  

jeevan kaa kaavyaatmak falsafa..sundar shabdon aur badhiya shailee mein likhaa hua..pasand aayaa....

alfaz 10 जून 2009 को 6:12 pm  

superb description about life.
u just not write a poem, but categorised different stages of whole life in one poem....,awesome,
maginificient, mind blowing.

कविता को शब्दों में बयान करना मुश्किल है, क्योंकि जीवन की शुरुवात से अंत तक सब लिख डाला.बहुत ही अच्छा विवरण किया है ज़िन्दगी का.
बस थोडी सी लम्बी है ..>

AlbelaKhatri.com 10 जून 2009 को 7:20 pm  

aatmvibhor kar diya
aapne toh aaj
ras se sarabor kar diya
BADHAI !

विनय 10 जून 2009 को 7:40 pm  

कविता थोड़ी बड़ी है पर सुगन्धित है

श्यामल सुमन 10 जून 2009 को 7:44 pm  

कविता लम्बी न लिखें न हो महज बयान।
भाव तो सुन्दर ही लगे आगे रखें ध्यान।।
शुभकामना।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Neeraj Bhargava 10 जून 2009 को 11:50 pm  

Sundar bhaav...accha laga padhna.

dr. ashok priyaranjan 11 जून 2009 को 12:15 am  

आधुनिक जीवन को आपने सीधे, सरल शब्दों में प्रभावशाली तरीके से काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है । आपकी कविता का कथ्य, शिल्प, भाव और विचार सभी प्रभावित करते हैं। सूक्ष्म संवेदना को आपने बडी बारीकी से रेखांकित किया है । बधाई ।-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Einstein 11 जून 2009 को 10:29 am  

Bahut khub ye huyee na bat...ese ami sacchi aur achhi dono ki upadhi se bibhushit karta hoon....Dhanyavad us man ko jo yahan tak laya hai apko....

Vijay Kumar Sappatti 11 जून 2009 को 10:39 am  

gargi ji .

aapki ye kavita jeevan ke ek shashwat staya ko darshati hai ...sach hai , hamen sach me kabhi bhi is satya ko nahi bhoolna chahiye ..

is rachna ke liye badhai .

मीत 11 जून 2009 को 11:19 am  

काँटों-सी निष्ठुर होती है जिंदगानी ...........
कैसे बताएं कितनी सुहानी ..............
होती है ये जीवन की कहानी ............
सच को उजागर करती हुयी सी है आपकी यह रचना... बहुत सुंदर लगी...
मीत

अनिल कान्त : 11 जून 2009 को 1:58 pm  

achchha likha hai aapne ...
jeevan ke kai rang likhein hain aapne....achchhi rachna

sarwat m 11 जून 2009 को 5:27 pm  

गार्गीजी, जीवन की उत्पत्ति से लेकर समापन तक की तस्वीर खींचती इस सफल रचना के लिए आपकी तारीफ जितनी भी की जाये, कम है. आप ने तो अपनी उम्र से बहुत..बहुत.. बहुत ही ज्यादा आगे जा कर रचना कर डाली. हम लोगों से कविता छुड़वाने का इरादा है क्या?

दिगम्बर नासवा 11 जून 2009 को 6:12 pm  

saty के kareeb likhi रचना ........

ajitji 14 जून 2009 को 1:11 am  

आपकी कविता का कथ्य, शिल्प, भाव और विचार सभी प्रभावित करते हैं।
। बधाई ।-

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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