संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
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गुरुवार, 4 जून 2009

हम तन्हा न मरे

ऐसे थमी है, ज़िन्दगी मेरी ।
जैसे पत्थर पर खिचीं हो, लकीरें गहरी।।

जाने किस उम्मीद पर ,सांस आ कर लौट जाती है।
जैसे सांसो से जुड़ी है, ज़िन्दगी तेरी।।

जाने किस जुर्म की, सज़ा पाते है ।
अब तो संसार बन गया ,है मेरी कचहरी।।

थमी थमी सी नज़र है , थमी सी है धड़कन।
कितनी थमी है ये, गम की दुपहरी।।

सब कुछ चला गया , अब कुछ बाँकी न रहा।
मैं खुद ही बनी हर पल, खुद की सहेली।।

मौला रहम ! ऐसा न हो कि तुझे ,कोई ख़ुदा न कहे।
तन्हा तो जी लिये है , पर हम तन्हा न मरे ।।

10 टिप्पणियाँ:

अनिल कान्त : 4 जून 2009 को 4:59 pm  

अंतिम पंक्ति बड़ी जानदार है
मज़ा आ गया

neeraj1950 4 जून 2009 को 5:09 pm  

आपमें बहुत अच्छा लिखने की संभावनाएं हैं...लिखती रहिये...
नीरज

अजय कुमार झा 4 जून 2009 को 5:38 pm  

घडियां बीत जाती हैं जो हो दुखभरी ,
बादल के पीछे है किरण सुनहरी ...

सुन्दर रचना लगी .....

श्यामल सुमन 4 जून 2009 को 6:01 pm  

लिखने की कोशिश भली अच्छा लगा प्रयास।
तन्हा कोई न मरे सुन्दर यह एहसास।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

विनय 4 जून 2009 को 7:43 pm  

अनुभवों की छाप गहरी है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 5 जून 2009 को 8:01 am  

जीवित के सब साथ हैं, मर कर बने अनाथ।
परमधाम में में मोक्ष का, मिल जायेगा साथ।।

मीत 5 जून 2009 को 10:57 am  

मौला रहम ! ऐसा न हो कि तुझे ,कोई ख़ुदा न कहे।
तन्हा तो जी लिये है , पर हम तन्हा न मरे ।।
its so nice...
meet

महामंत्री - तस्लीम 5 जून 2009 को 6:15 pm  

आपके दिल से निकले जज्बात सीधे हमारे दिल में उतर गये।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रंगनाथ सिंह 8 जून 2009 को 7:09 am  

yadi aap kavita karm ko gambhirata se leti h to...
aap me kavitva ki kafi sambhavanaye hai lekin mere simit samajh ke anusar aap ko kavita ke craft par bahut parisram ki jarurat h.

alfaz 8 जून 2009 को 3:44 pm  

इंसान धीरे- धीरे ही सफलता की सीडिया चदता हैं.
मेरे ख्याल में अपने पहले सीडी चढ़ ली है. आखरी लाइन बहुत ही उम्दा और कविता को ग़ज़ल बनाती है.
लिखते रहिये !

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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