संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शनिवार, 20 जून 2009

मै तुम्हारी परछाई तो हूँ ,,,


मेरे हाथ में तुम्हारा हाथ नहीं
पर धुप में तुम्हारी परछाई तो हूँ

मै कभी तुम्हारे साथ नहीं
पर अनदेखी तन्हाई तो हूँ

मै वफ़ा नहीं हूँ प्यार नहीं
कुछ ना सही हरजाई तो हूँ

मै आगाज़ नहीं अंजाम नहीं
रोती आँखों की रुसवाई तो हूँ

तुम हो निरा अकेली दुनिया में
पर मै तुम्हारी परछाई तो हूँ ,,,
 
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी''  जी की रचना 

14 टिप्पणियाँ:

‘नज़र’ 20 जून 2009 को 11:23 am  

मै आगाज़ नहीं अंजाम नहीं
रोती आँखों की रुसवाई तो हूँ

काश यह मैंने लिखा होता!

ओम आर्य 20 जून 2009 को 11:57 am  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ओम आर्य 20 जून 2009 को 11:57 am  

mai to yah kahunga ki jisane bhi yah likha .......
usako mera salaam

Science Bloggers Association 20 जून 2009 को 4:18 pm  

जिंदगी की तस्वीर दिखाने वाली रचना।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

परमजीत बाली 20 जून 2009 को 5:22 pm  

बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

ajitji 20 जून 2009 को 8:52 pm  

shukriya aap sabhi ko,
aise hi sneh dete rahen

sarwat m 20 जून 2009 को 9:44 pm  

कविता भावों की दृष्टि से बेहतरीन है. आप थोड़ा सा कविता के व्याकरण पर ध्यान दें. अच्छा तो यह होगा कि अपने मित्रों में से ही, जिसे इस विधा में निपुण मानते हों, परामर्श लें. सीखना अंतिम सांस तक जारी रहता है. हम सब मां के गर्भ से कविता सीख कर नहीं आये. मेरी बातें अगर बुरी लगें तो मुझे खरी खोटी जरूर सुना देना. और हाँ, इस टिप्पड़ी को डिलीट मत कर देना.

Udan Tashtari 21 जून 2009 को 5:01 am  

भावपूर्ण रचना.बधाई.

Manish Kumar 21 जून 2009 को 10:58 am  

अच्छा लगा आपकी ये रचना पढ़कर। शायद टंकण में गलती से धुप लिखा रह गया है उसे धूप कर लें।

hello 21 जून 2009 को 3:02 pm  

वाह ........... बहुत सुंदर रचना

woyaadein 21 जून 2009 को 11:09 pm  

अच्छी और भावपूर्ण कविता......पढ़कर अच्छा लगा.....अजीत जी को बधाई और आपको भी.....

साभार
हमसफ़र यादों का.......

alfaz 22 जून 2009 को 12:13 pm  

bahut hi manmohini rachna ,
man ko bahut acchi lagi.
alfaz.

ajitji 28 जून 2009 को 12:45 am  

aap sabhi ko bahut babhut dhanyawaad..

Sarwat ji ,, aapke sujhav ke liye tahe dil se dhanyawad,, mai koshish karunga,,
aise hi sujhav aur sneh dete rahen

jamos jhalla 28 जून 2009 को 11:18 am  

parchaai,rusvaai aur HARJAAI aaj ke dour me majority me hai.isiliye prabhu lagtaa hai ki bahusankhyakon ki baraat me shaamil honaa chahte ho.
jhallevichar.blogspot.com

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