संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

बुधवार, 3 जून 2009

मुझे मनाने आओगे ना

मुझे मनाने आओगे ना
अनजाने से दर्द की प्यास बुझाओगे ना
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना

एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना

मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना

तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना

तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना

जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,,
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी''  जी की रचना 
 

9 टिप्पणियाँ:

abhivyakti 3 जून 2009 को 12:52 pm  

अजीत जी आप के इस योगदन के लिए बहुत बहुत आभार! :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 3 जून 2009 को 1:11 pm  

दिल का गहराइयों से निकली सुन्दर रचना।
बधाई।

मीत 3 जून 2009 को 2:56 pm  

प्रेम से भरी सुंदर रचना....
बहुत अच्छी लगी...
मीत

"लोकेन्द्र" 3 जून 2009 को 5:32 pm  

दिल की अभिव्यक्ति है शब्दों के माध्यम से......
सुन्दर रचना........

श्यामल सुमन 3 जून 2009 को 6:19 pm  

सुन्दर रचना।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

परमजीत बाली 3 जून 2009 को 10:24 pm  

सुन्दर रचना है।बधाई।

AlbelaKhatri.com 6 जून 2009 को 9:31 am  

hay hay..............maar dala................
bahut bachha !

ajitji 14 जून 2009 को 1:12 am  

shukriya,, aap sabhi k,,,,,,,,,,,,

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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