संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 2 जून 2009

आज काल शहर में


आज काल शहर में, सन्नाटे बहुत गहरे हुए जाते है । 
कोई रोको हमे की हम, अब प्यार में दिवान हुए जाते है ।।
 
तेरे ख्याल बस अब मेरे, जीने के सहारे हुए जाते है ।
वरना आज काल तो खुद ही हम, खुद से वेगाने  हुए जाते है ।।
 
ज़िन्दगी ले चली है, हमे जाने किस मोड़ पर।
अब तो रास्ते ही मेरे, ठिकाने हुए जाते है ।।
 
मोहब्बत का करम है, जो मुझे ये किस्मत बक्शि।
अब तो बातो- में न जाने ,कितने फसाने हुए जाते है।। 
 
चंद लम्हो में मिली ,है जो दौलत हम को ।
इतने नशे में है,कि मयखाने हुए जाते है।। 
 
मेरी बातो को हसी में न लेना, मैं सच कहती हूँ  ।
कि अब हर खुशी के आप ही, बहाने हुए जाते है ।।
 
रुकी-रुकी सी नदी थी, ये  जिन्दगी मेरी ।
अब तो रुकना-ठहरना  लगता है, अफ़साने हुए जाते है।। 

6 टिप्पणियाँ:

Rajat Narula 2 जून 2009 को 11:43 am  

मोहब्बत का करम है, जो मुझे ये किस्मत बक्शि।
अब तो बातो- में न जाने ,कितने फसाने हुए जाते है।।

Bahut sunder , bhavpurn rachna hai...

Alfaz 2 जून 2009 को 1:15 pm  

acaha prayas hai,चंद लम्हो में मिली ,है जो दौलत हम को । इतने नशे में है,कि मयखाने हुए जाते है। char chand lagane ke liye, urdu ke alfaz bhi likheye.

Einstein 2 जून 2009 को 1:17 pm  

ज़िन्दगी ले चली है, हमे जाने किस मोड़ पर।
अब तो रास्ते ही मेरे, ठिकाने हुए जाते है ।।

Lagta hai ese jiya gaya hai..phir likha gaya hai...!!!

kya ye ek saval nahi hai...khud se..

Chala to hame prakirti deti hai|

Lekin har mor pe Visamrti deti hai||

Ki kab chalana hai....

aur kab sambhalna hai...||

sandhyagupta 2 जून 2009 को 3:51 pm  

रुकी-रुकी सी नदी थी, ये जिन्दगी मेरी ।
अब तो रुकना-ठहरना लगता है, अफ़साने हुए जाते है।।

Bahut khub.Badhai.

विनय 2 जून 2009 को 6:33 pm  

ख़ूबसूरत ख़्यालात

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