संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

रखा क्या है अहंकार में....!!

बदलने लगी हूँ ......
तेरे प्यार में!!

खोने लगी हूँ ......
तेरी राह में!!

सब से अलग हूँ ......
मैं संसार में!!

जब से जुड़ी हूँ ......
तेरे साथ में!!

संभालने लगी हूँ ......
मझधार में!!

बस गया बस तू ही तू ......
मेरी हर सांस में!!

आता मजा है ......
अब तिरस्कार में!!

डूबी हूँ तुझ में ......
रखा क्या है अहंकार में ???

15 टिप्पणियाँ:

महफूज़ अली 17 दिसंबर 2009 को 4:12 pm  

बेहतरीन शब्दों के साथ सुंदर कविता...

श्रीश पाठक 'प्रखर' 17 दिसंबर 2009 को 4:18 pm  

हाँ, अहंकार मे तो वाकई कुछ नही रखा है..सुंदर अभिव्यक्ति...

Manvinder 17 दिसंबर 2009 को 4:29 pm  

सुंदर कविता...

sada 17 दिसंबर 2009 को 4:37 pm  

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

M VERMA 17 दिसंबर 2009 को 4:58 pm  

डूबी हूँ तुझ में ......
रखा क्या है अहंकार में ???
वाकई अहंकार में कुछ नही रखा है.
सुन्दर रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 17 दिसंबर 2009 को 7:35 pm  

बढ़िया रचना शब्दों की मुहताज नही है!
आपकी रचना इसका प्रमाण है!

parveen kumar snehi 18 दिसंबर 2009 को 12:27 pm  

kam se kam shabdon me kya-kuchh kahaa ja sakta hai. aapki kavita me dikhata hai.

dweepanter 21 दिसंबर 2009 को 3:17 pm  

बहुत ही सुंदर रचना है।
pls visit.......
www.dweepanter.blogspot.com

अर्चना तिवारी 21 दिसंबर 2009 को 6:02 pm  

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति...

Rajey Sha 23 दिसंबर 2009 को 8:18 pm  

अहंकार से उबरने पर मजे ही मजे हैं जी।

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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