संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है


यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है
मेरे तो चारों तरफ आग ही आग है!!
कितनी अकुलाहट भरी है जिन्दगी
हर तरफ चीख-पुकार भागमभाग है!!
अब तो मैं अपने ही लहू को पीऊंगा
इक दरिंदगी भरी अब मेरी प्यास है!!
मेरे भीतर तो तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा
मुझपर ऐ दोस्त अंधेरों का लिबास है!!
हर तरफ पानियों के मेले दिखलाती है
उफ़ ये जिंदगी है या कि इक अजाब है!!
हर लम्हा ऐसा गर्मियत से भरा हुआ है
ऐसा लगता है कि हयात इक आग है !!
हम मर न जाएँ तो फिर करें भी क्या
कातिल को हमारी ही गर्दन की आस है!!
रवायतों को तोड़ना गलत है "गाफिल"
यही रवायतें तो शाखे-दरख्ते-हयात हैं!!
कवि : राजीव जी की रचना

9 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार 2 दिसंबर 2009 को 11:01 am  

जिंदगी का भयावह चित्रण है इस रचना में

अनिल कान्त : 2 दिसंबर 2009 को 11:12 am  

एक बेहतरीन रचना है ये
पढ़कर बहुत अच्छा लगा

अनिल कान्त : 2 दिसंबर 2009 को 11:12 am  

आप बहुत दिनों से गायब हैं मोहतरमा

M VERMA 2 दिसंबर 2009 को 11:32 am  

कातिल को हमारी ही गर्दन की आस है!!
बेहतरीन रचना. हर शेर लाजवाब

महफूज़ अली 2 दिसंबर 2009 को 11:41 am  

बहुत बेहतरीन रचना.......

बधाई....

Ram 2 दिसंबर 2009 को 12:09 pm  

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alfaz 2 दिसंबर 2009 को 9:12 pm  

सच का एक अनोखा पेह्लो दर्शाती हा ये रचना। बहुत खूब ।

Babli 4 दिसंबर 2009 को 6:30 am  

इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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