संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

हम ही पागल हो गये.....

हम ही पागल हो गये ,
परछाइयो के पीछे,
खुशिया आ कर वह गई ,
हम रहे आँख मीचे - मीचे
ज़िन्दगी चलती रही,
एक पल भी न रूकी
हम राह तेरी तकते रहे
आंख भी पत्थरा गई
ज़िन्दगी चलती रही
हम होसला रखते रहे
पल पल युही जलते रहे
चाँदनी के नीचे
भीग लेते हम बहुत
बारिशे बरसी नही
आंख ही भिगोती रही
बिस्तरे का कोना
आस की पलकों से ऐसे
विश्वास तप से गिर गया
कांच का सपना था मेरा
खन से टूटा और बिखर गया
पर आंख में चुभता रहा
हम ही पागल हो गये......

हम ही पागल हो गये......

3 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 18 मार्च 2010 को 1:23 pm  

कांच का सपना था मेरा
खन से टूटा और बिखर गया
पर आंख में चुभता रहा
हम ही पागल हो गये.....


बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

Vijay Kumar Sappatti 14 अप्रैल 2010 को 1:51 pm  

dard ki gahan abhivyakti hai ye kavita ..shabd chub gaye hai man me ....

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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" अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का , यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है…."

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