संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

पल पल बदल रही हूँ

पल पल बदल रही हूँ....
तेरे साथ में ....!!
खुद से ही मिल रही हूँ ....
तेरे इंतज़ार में ....!!
जाने क्या अदा है ....
तेरे दुलार में ....!!
परियो सी कहानी है ....
ज़िन्दगी तेरे साथ में ....!!
खुशबू सी घुल रही है ....
हर एक रह में ....!!
जोगन सी बन गई हूँ ....
तेरे याद में ....!!
हर काम चल रहा है ....
तेरे ध्यान में ....!!
चल रही है सांस ....
तेरे इंतज़ार में ....!!

17 टिप्पणियाँ:

sangeeta swarup 26 मार्च 2010 को 11:43 am  

खूबसूरती से एहसास लिखे हैं....खूबसूरत नज़्म

रंजना [रंजू भाटिया] 26 मार्च 2010 को 12:53 pm  

भाव पूर्ण अभिव्यक्ति सुन्दर एहसास हैं इस में शुक्रिया

alfaz 26 मार्च 2010 को 1:18 pm  

bahut sundar aur nirmal rachna bilkul aap ki tarah. cutest poem by cutest girl in the world.
miss u too....., keep smiling.
I love your smile and your poetry.

Rohit "meet" 26 मार्च 2010 को 2:16 pm  

पल पल बदल रही हूँ....
तेरे साथ में ....!!
खुद से ही मिल रही हूँ ....
तेरे इंतज़ार में ....!!
wah bahut sundar rachna shubhkamna

Ravi 26 मार्च 2010 को 5:33 pm  

aapki yeh kavita kisi ke hone ka ehsas dilati hai. bahut acchi kavita hai, aap aisi hi likhti rahiye, plz send my mail this poem.

Thanks

सूर्य गोयल 26 मार्च 2010 को 7:45 pm  

पल पल बदल रही हूँ....
तेरे साथ में ....!!
खुद से ही मिल रही हूँ ....
तेरे इंतज़ार में ....!!
अपने दिल के भावो को जिस तरह सुन्दर शब्दों में पिरो कर आपने कविता पेश की है उसके लिए तो मै यही कहूँगा की गजब की लेखनी और अजब भावो के लिए जितनी तारीफ करूँ उतनी कम है. फर्क इतना है की मै कुछ ऐसे ही भावो से गुफ्तगू करता हूँ और आप कविता लिखती है. कभी समय निकाल कर मेरी गुफ्तगू में भी शामिल हो तो अच्छा लगेगा.
www.gooftgu.blogspot.com

भूतनाथ 27 मार्च 2010 को 10:35 am  

उफ़.....क्या बात कही है....कितनी मुलायम......कितनी गहरी.....वाह.......!!

Gopal Singh 27 मार्च 2010 को 3:02 pm  

bahut sundar rachna hai aapki. sabdo ko acha piroya hai lekin sabdo ko thoda sa kifayat se barte to kavita or sukun degi. keep it up :)

Dikshit Ajay K 6 अप्रैल 2010 को 12:19 pm  

महोदय,

पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता रहा है. समय समय पर बिभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और यहाँ तक की धार्मिक संगठन भी अपने विवादास्पद बयानों के द्वारा खुद को लाइम लाएट में बनाए रखने के लोभ से कुछ को नहीं बचा पाते. पर इस आन्दोलन के खोखलेपन से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है शायद तभी यह हर साल किसी न किसी विवादास्पद बयान के बाद कुछ दिन के लिए ये मुद्दा गरमा जाता है. और फिर एक आध हफ्ते सुर्खिओं से रह कर अपनी शीत निद्रा ने चला जाता है. हद तो तब हुई जब स्वतंत्र भारत की सब से कमज़ोर सरकार ने बहुत ही पिलपिले ढंग से सदां में महिला विधेयक पेश करने की तथा कथित मर्दानगी दिखाई. नतीजा फिर वही १५ दिन तक तो भूनते हुए मक्का के दानो की तरह सभी राजनैतिक दल खूब उछले पर अब १५ दिन से इस वारे ने कोई भी वयान बाजी सामने नहीं आयी.

क्या यह अपने आप में यह सन्नाटा इस मुद्दे के खोख्लेपर का परिचायक नहीं है?

मैंने भी इस संभंध में काफी विचार किया पर एक दुसरे की टांग खींचते पक्ष और विपक्ष ने मुझे अपने ध्यान को एक स्थान पर केन्द्रित नहीं करने दिया. अतः मैंने अपने समाज में इस मुद्दे को ले कर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया जिस में विभिन्न आर्थिक, समाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक वर्ग के लोगो को शामिल करने का पुरी इमानदारी से प्रयास किया जिस में बहुत की चोकाने वाले तथ्य सामने आये. २-४०० लोगों से बातचीत पर आधारित यह तथ्य सम्पूर्ण समाज का पतिनिधित्व नहीं करसकते फिर भी सोचने के लिए एक नई दिशा तो दे ही सकते हैं. यही सोच कर में अपने संकलित तथ्य आप की अदालत में रखने की अनुमती चाहता हूँ. और आशा करता हूँ की आप सम्बंधित विषय पर अपनी बहुमूल्य राय दे कर मुझे और समाज को सोचने के लिए नई दिशा देने में अपना योगदान देंगे.

http://dixitajayk.blogspot.com/search?updated-min=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&updated-max=2011-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&max-results=6
Regards

Dikshit Ajay K

Vijay Kumar Sappatti 14 अप्रैल 2010 को 1:50 pm  

Gaargi , deri se aane ke liye bahut bahut maafi .... kuch uljhane thi ...

kavita ,sirf kavita nahi hai ,balki shabdo ka aisa sansaar hai ,jisme padhne waal adoob jaata hai .. tumne prem ke junoon ko itne acche se itne behatreen aur bhaavmay shabdo me daala hai ki kya kahu.. bas kayi baar padh liya aur ji liya prem ki anubhuti ko ......

tumhara lekhan ab kahi jyaada behtar ho gaya hai aur word composition bhi ab acchi ho gayi hai .... mujhe bahut khushi hongi ,ki tum aur likho aur aage bahut aage sitaaro me apne lekhan ka naam likho ...

regards

vijay

Ravish Tiwari (रविश तिवारी ) 23 अप्रैल 2010 को 2:49 am  

बहुत सुन्दर रचना है, बधाई स्वीकार करें

Ravish,
http://alfaazspecial.blogspot.com

neha 3 मई 2010 को 6:15 pm  

बहुत सुन्दर....

amit destiny! 11 जून 2010 को 9:21 pm  

bahut samay baad chittajagat mein wapas aaya hoon,aapka blog padha,bahut accha likhti hai aap,

aur aapki is rachnaa ne hriday chu liya aur mujhe kisi ki yaad dila di........
jiski yaad dilayi unke liye maine apneblog par kuch likha hai,aap mere blog par saadar aamantrit hai......

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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