संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

तुम नयन गगन से उतर रहे हो....

तुम नयन गगन से उतर रहे हो....
इस मन के समतल पर....!!
मैं धारा सी मचल रही हूँ ....
सागर के हिर्दय पर ....!!
मैं मयूर-सी नाच रही हूँ ....
तेरी ही सरगम पर ....!!
चंचल नयन पखुरु हो गये ....
उठते है ,संग तुम को लिये गगन पर....!!
तुम नयन गगन से उतर रहे हो....

18 टिप्पणियाँ:

दीपक 'मशाल' 27 अप्रैल 2010 को 6:01 pm बजे  

achchhe bimbon ka prayog laga .. lekinprem se itar bhi kuchh likhiye.. sirf premkahani ya apna gum likhna sabkuchh nahin.

वन्दना अवस्थी दुबे 27 अप्रैल 2010 को 6:08 pm बजे  

बहुत अच्छी उपमाएं, सुन्दर प्रणय-गीत.

M VERMA 27 अप्रैल 2010 को 6:15 pm बजे  

तुम नयन गगन से उतर रहे हो....
बेहद खूबसूरत

दिलीप 27 अप्रैल 2010 को 7:46 pm बजे  

bahut khoob..prem par likhte rahiye...bahut khoob

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 27 अप्रैल 2010 को 8:27 pm बजे  

बहुत सुन्दर रचना!
बिम्बों का प्रयोग बहुत बढ़िया ढंग से किया गा है!

मनोज कुमार 27 अप्रैल 2010 को 8:43 pm बजे  

एक अदम्य जिजीविषा का भाव कविता में इस भाव की अभिव्यक्ति हुई है।

उम्मीद 28 अप्रैल 2010 को 9:45 am बजे  

aap sabhi ke is protsahan ke liye bhut bhut dhanyabad.
Deepak ji aap jaroor or bhi bishayo par rachnaye padainge.....main puri koshish karugi ki lekhni ki abhivyakti or bistrit ho ....aap ke is sujhab ke liye abhar

Shekhar Kumawat 28 अप्रैल 2010 को 10:05 am बजे  

BAHUT KHUB

BADHAI IS KE LIYE AAP KO


SHEKHAR KUMAWAT

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) 29 अप्रैल 2010 को 3:44 pm बजे  

कविता है.....और सच भी.....दर्शन भी...और हकीकत भी.....जीवन भी है और धर्म भी......इसिलिये होता है कविता में जीवन का मर्म भी.....!!!!सच कविता में बड़ा अर्थ है....!!!
कभी-कभी कुछ सरल से शब्द ज्यादा सच्चाई से जीवन को....और उसकी गहराई को व्यक्त कर जाते हैं.....ऐसी ही लगी यह कविता आपकी मुझे....लिखती रहे.....आभार

Ra 30 अप्रैल 2010 को 6:32 am बजे  

एक सुन्दर रचना

http://athaah.blogspot.com/

alfaz 3 मई 2010 को 5:55 pm बजे  

bahut khub ! aapko meri taraf se bahut sare ladu , pede...... is kavita ke liye. manmohani panktiyon ke liye dhanyawad.

pooja 3 मई 2010 को 6:14 pm बजे  

बहुत अच्छी.....ur way of expression thoughts is really very good... i like it

Esydownloads 4 मई 2010 को 1:29 am बजे  

awesome blog i like ur post man
i have add ur link in my "Drop down menu "(Blog i read)

Achha hai sahi !!
thanks
R.Yadav

Amit Kumar Sendane 11 जून 2010 को 9:16 pm बजे  

hriday sparshi rachnaa.........bht acchi lagi.....shubkamnayein

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