संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
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गुरुवार, 4 मार्च 2010

तेरे काँधे पर हम हो....

गुलिस्ता बने हम
हर तरफ फैली हो महक तेरी
जब तेरे काँधे पर सर हो....

जिन्दगी लगती है
मिश्रि की डली
जब तेरे काँधे पर सर हो....

सोचती हुँ मैं बस
यही गुम सुम
कि तेरे काँधे पर सर हो....

बन जाती हुँ सब से संपन्न
सुखी सारे जहाँ में
जब तेरे काँधे पर सर हो....

ये कोई सपना है
जगाना न हमें
जब तेरे काँधे पर सर हो....

सोये से मन में तमन्ना जागी है
जब चले दुनिया से
तो तेरे काँधे पर हम हो....

चलू मैं तुझ को सराहती
सिसकती रहे पीछे दुनिया सारी
और मुस्कराते तेरे काँधे पर हम हो....

3 टिप्पणियाँ:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" 5 मार्च 2010 को 9:41 am  

सिसकती रहे पीछे दुनिया सारी
और मुस्कराते तेरे काँधे पर हम हो....

kin shabdeon mein tareef karun, samajh nai aa raha hai...

very nice.

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) 7 मार्च 2010 को 10:11 am  

waahi gaargi ji bhut hi sundar bhaav liye huye kavita hai ye bhaav tabhi aate hai jab prem me samarpan ki bhavnaa aa jaati hai
saadar
praveen pathik
9971969084

Vijay Kumar Sappatti 14 अप्रैल 2010 को 1:52 pm  

gaargi , maine pahle is kavita ko padha tha aur bahut der tak chup raha tha .....

This is an amazing work of words ... tumhari lekhni ko salaam.. mujhe apne collections ke liye ye poem chahiye ...pls bijwaayiye ...

regards

vijay

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