संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 26 मई 2009

हम तो बस करतब दिखा रहे हैं......!!


चार बांसों के ऊपर झूलती रस्सी.....
रस्सी पर चलता नट
....
अभी गिरा,अभी गिरा,अभी गिरा

मगर नट तो नट है ना

चलता जाता है
....
बिना गिरे ही

इस छोर से उस छोर

पहुँच ही जाता है
.....!!
इस क्षण आशा और

अगले ही पल इक सपना ध्वस्त
....!!
अभी-अभी
.....
इक क्षण भर की कोई उमंग

और अगले ही पल से

कोई अपार दुःख

अनन्त काल तक

अभी-अभी हम अच्छा-खासा

बोल बतिया रहे थे और

अभी अभी टांग ही टूट गई
....!!
कभी बाल-बच्चों के बीच
....
कभी सास बहु के बीच
.....
कभी आदमी औरत के के बीच

कभी मान-मनुहार के बीच

कभी रार-तकरार के बीच
....
कभी अच्छाई-बुराई के बीच

कभी प्रशंसा-निंदा के बीच

कभी बाप-बेटे के बीच

कभी भाई-भाई के बीच

कभी बॉस और कामगार के बीच

कभी कलह और खुशियों के बीच

कभी सुख और के बीच
....
जैसे एक अंतहीन रस्सी

इस छोर से उस छोर तक

बिना किसी डंडे के ही

टंगी हुई है ,और हम

एक नट की भांति

करतब दिखाते हुए

बल खाते हुए

गिरने-संभलने के बीच

चले जा रहे हैं
.....
बिना यह जाने हुए कि
....
दूसरा जो छोर है
....
उस पर तो मौत खड़ी हुई है
....
हम संभल भी गए तो

कोई अवसर नहीं है
....
कुछ भी पा लेने का.....!!!!

कवि : राजीव जी की रचना

4 टिप्पणियाँ:

alfaz 26 मई 2009 को 5:33 pm  

very enjoying and childish recitation, remembering of childhood days.
woh kagaz ki kashti , wo barish ka pani, wo mohalle ki sabse nishani purani, woh budiya jise bache kehten thi nani. ,,,,

विनय 27 मई 2009 को 7:17 am  

राजीव जी रचना पढ़वाने का शुक्रिया!

मीत 27 मई 2009 को 11:41 am  

जैसे एक अंतहीन रस्सी
इस छोर से उस छोर तक
बिना किसी डंडे के ही
टंगी हुई है ,और हम
एक नट की भांति
करतब दिखाते हुए
बल खाते हुए
गिरने-संभलने के बीच
चले जा रहे हैं.....
बिना यह जाने हुए कि....
दूसरा जो छोर है....
उस पर तो मौत खड़ी हुई है....
gargi i have no word for this....
its orsam
meet

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) 11 जून 2009 को 12:55 pm  

एक नट की भांति
करतब दिखाते हुए
बल खाते हुए
गिरने-संभलने के बीच
चले जा रहे हैं.....
बिना यह जाने हुए कि....
दूसरा जो छोर है....
उस पर तो मौत खड़ी हुई
गार्गी जी बहुत ही सुन्दर रचना
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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