संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

मंगलवार, 18 मई 2010

दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके...

दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके
देखिये सारे शिकवे-गिले को भुला करके
दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके

वफा के बदले अब नहीं मिलती वफा
हमने तो देखा है ये भी तजुर्बा करके

खुशिया भी मिली तो अजनबी बनके
जब से गया वो गम से आशना करके

ख्यालो कि मंजिल कदम-२ पे टकराएगी
देखो किसी कि यादों को रास्ता करके

मिलेगा सुकून कीजिये बेवफाई का गिला
देखिये "मीत" ये भी कभी होंसला करके

कवि : रोहित कुमार "मीत" जी की रचना

5 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 18 मई 2010 को 10:58 am  

बहुत सुन्दर रचना है!
पिछले 6 दशकों को से इसका ही तो
फल भोग रहे हैं!

kunwarji's 18 मई 2010 को 12:48 pm  

ek dam sahi baat...

kunwar ji,

दिलीप 18 मई 2010 को 2:23 pm  

खुशिया भी मिली तो अजनबी बनके
जब से गया वो गम से आशना करके waah bahut khoob...

Dhiraj Shah 21 मई 2010 को 4:10 pm  

सुन्दर कविता

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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