संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

सोमवार, 20 जुलाई 2009

और कहीं अरमान धुल रहे थे


आदम कद दीवारों से घिरा आँगन
दो अल्हड जवानियों को
मिलाने लगा था,,
की साथ दिया तुने भी खुदा
हर बूँद के साथ
मिलन को सुहावना बना दिया
झमाझम करके बरसते बादलों से ,,
होंठ थरथरा उठे थे ,,
मिलन का नव विस्तार हो रहा था .

उन्ही दीवारों के बाहर
कोई और भी था
एक लड़का और हाथ में बच्ची
फटेहाल बेहाल , जाने किस हाल में
एक छत होती थी सर पे रोज
सूखे आसमान की ..
आज तुने वो भी छीन ले खुदा
बच्ची मरने की सी हालत में आ गई है
और लड़के के होंठ थरथरा उठे हैं
शायद पेट भूखा होने से ..
शायद ठण्ड ज्यादा है ,,
या शायद नवजात की बेबसी पर
..
बरसात तो की खुदा
मगर ये क्या हश्र हुआ
बरसात ने दो को मिलाया
दो को मिटाने जुट गई

बरसात में अरमान तो
दोनों तरफ थे
बस फर्क ये था मेरे खुदा
कहीं अरमान घुल रहे थे
और कहीं
अरमान धुल रहे थे
 
कवि : ''अजीत त्रिपाठी'' जी की रचना

9 टिप्पणियाँ:

उम्मीद,  20 जुलाई 2009 को 12:05 pm बजे  

अजीत जी आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक',  20 जुलाई 2009 को 2:18 pm बजे  

बरसात में अरमान तो
दोनों तरफ थे
बस फर्क ये था मेरे खुदा
कहीं अरमान घुल रहे थे
और कहीं
अरमान धुल रहे थे

अजीत जी को बधाई।
आपका धन्यवाद।

सुरेन्द्र "मुल्हिद",  20 जुलाई 2009 को 2:45 pm बजे  

bahut he achhi rachna...
dil ko chhu leni wali baat kahi hai....
keep writing good...

surender
http://shayarichawla.blogspot.com/

M VERMA,  20 जुलाई 2009 को 7:04 pm बजे  

विसंगतिया वाकई पीडा बन जाती है
सुन्दर रचना

ajitji,  20 जुलाई 2009 को 8:07 pm बजे  

aap sabhi ko bahut bahut dhanyawaad,,
aise hi sneh dete rahen

alfaz,  21 जुलाई 2009 को 4:18 pm बजे  

ati sundar . lagta hai
mausam ke hisab likhi gayi hai.
shukriya .

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर,  21 जुलाई 2009 को 8:26 pm बजे  

इतनी सुन्दर रचना के लिए आप को बधाई।

Prem,  24 जुलाई 2009 को 5:23 pm बजे  

bahut sunder rachna badhai svikaar kare

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