संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

इसे क्या कहते है

तेरे जाने पर जान पाये ,
कि विश्वासघात किस कहते है ।
बस ता- उम्र यही सोचैगे,
कि प्यार किस कहते है । ।

तुम से मिल कर ही समझ पाये,
कि धोखा किस कहते है।
हर घड़ी हर पल दिल में होती है मशक़्क़त,
कि जो तुमने किया उसे क्या कहते है । ।

रोते हस्ते कट जायेगी ये ज़िन्दगी भी ,
पर हर साँस के साथ हम वेबफा तुम्ह कहते है।
एक बार तो आनी है उम्र भर कि नीद,
पर हर रात को जग कर पल पल मरना मुझे कहते है। ।

हर दम दे जाता है नया गम,
क्या सच में प्यार इसी को कहते है ।
जब भी चाही खुशी रुस्बैया मिली ,
क्या किस्मत इसी को कहते है । ।

8 टिप्पणियाँ:

अनिल कान्त : 24 अप्रैल 2009 को 4:16 pm  

jo raaze wafa humse unhone poonchha
ki mohabbat kya hai ...

bas ek aah nikli is toote dil se

priya 24 अप्रैल 2009 को 4:26 pm  

kisi ke jane ka dukh hum khud hi samajh sakte.


priya

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 24 अप्रैल 2009 को 5:12 pm  

नमस्कार,
इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा।
सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
शब्दकार
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 24 अप्रैल 2009 को 5:17 pm  

गार्गी गुप्ता!
आपने अपनी कविता में शब्दों को सुन्दर ढंग से पिरोया है।
इससे भावों में जीवन्तता आ गयी है।
अभिव्यक्ति सुन्दर और ग्राह्य है।
आपके ब्लाग पर देर से आया हूँ।
अन्तर्-जाल पर ब्लागिंग की दुनियाँ में आपका स्वागत है।

मीत 24 अप्रैल 2009 को 11:30 pm  

क्या बात है ! खूब लिखा है ...

श्यामल सुमन 25 अप्रैल 2009 को 7:30 am  

सुन्दर प्रसतुति। कहते हैं कि-

निकाला काँटे काँटा कभी कभी हमने।
चुभते तो दोनो मगर एक मेहरबान ठहरा।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

भूतनाथ 25 अप्रैल 2009 को 8:20 am  

बहुत खूब.......अच्छी रचना.....

Reality Bytes 25 अप्रैल 2009 को 1:20 pm  

प्यार तो हमने भी निभाया है
न कह हम को धोखेबाज़
न हमने किया है विश्वासघात
प्यार को हमने आत्माओं का
तराना माना है ,ना के जिस्मो का मिलन
मर के भी भी रहेगी तेरे आगोश की खुशबू
तेरी हर आह से टपकेंगे
मेरे दिल से खून के आंसू
क्या कीजिये जो हमने किया
उसे हम लड़की की समाजिक मजबूरी कहते हैं

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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