संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

मेरी तनहाई...

मेरे पास है बस मेरी तनहाई
बस इसी ने ही दोस्ती निभाई।
जब छोड रही थी मुझे मेरी परछाई
तब इसी ने आकार हिम्मत बंधाई।।

है पास मेरे मेरी तन्हाई
फिर किसी से रखु कैसी रुसबाई।
चन्द लम्हो में सारा जहाँ लुट गया
एक दौलत बची वो थी तनहाई।।

भूल बैठे थे हम इस हसी दोस्त को
पर चुप रह कर भी जो साथ चली वो थी मेरी तन्हाई ।
भरोसा है मुझे जब कोई साथ न होगा
तब साथ देगी मेरा मेरी तनहाई।।

तू अगर साथ है तो फिर कैसी रुसबाई
बस एक तू ही मेरे मन को है भाई।
संग चलती है मेरे खामोश रह कर
किस कदर शुक्रिया अदा करु मैं अदा मेरी तनहाई ।।

4 टिप्पणियाँ:

saurabh kunal 27 अप्रैल 2009 को 4:07 pm  

आपकी हाल फिलहाल की तमाम रचनाओं में असंतेष और निराशा की झलक दिखाई पड़ती है। वैसे लेखन अच्छा है। पुरानी रचनाएं भी पढ़ी .. कमाल की है.... लिखते रहिए..क्योंकि जिस दिन कलम रुक गई.. हमारा मानसिक विकास रुक जाएगा... सस्नेह... धन्यवाद

SAHITYIKA 27 अप्रैल 2009 को 9:39 pm  

bahut badhiya..
tanhai ko aapne bahut hi achche dang se prastut kiya hai..

Einstein 26 मई 2009 को 3:45 pm  

apki buddhi ne achha vyayam kiya hai tanhai ko mitra batane ke liye...Likhte rahiye...

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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