संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

सह लिया हर दर्द

सह लिया हर दर्द हमने हस्ते हस्ते,
उजड़ गया घर मेरा यारो बस्ते बस्ते।
अब वफा करे तो किस से करे यारो,
वफा करने गये तो बेवफा ही मिल रास्ते रास्ते।।


ज़रूरी तो नही जीने के लिये सहारा हो,
ज़रूरी तो नही हम जिनके हैं वो हमारा हो ।
कुछ खुशियाँ डूब भी जाती हैं,
ज़रूरी तो नही के हर कश्ती के कोई किनारा हो।।



सपनो का तरह आकार चले गये,
आपनो को भुला कर चले गये ।
किस भूल की सज़ा थी आपने हमें,
पहले हसाया, फिर रुला कर चले गये ॥

5 टिप्पणियाँ:

अनिल कान्त : 29 अप्रैल 2009 को 11:31 am  

दिल और दिल का दर्द....एक सोच ..आखिर वजह क्या थी ...
बेहतरीन रचना है जी

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

RAJNISH PARIHAR 29 अप्रैल 2009 को 1:56 pm  

अब वफ़ा करें तो किस्से से करें...यही तो समस्या है आज की ...सब आजमायें हुए है...

परमजीत बाली 29 अप्रैल 2009 को 1:58 pm  

बढिया रचना है।बधाई।

दिल का दर्द 30 अप्रैल 2009 को 2:14 pm  

ये दर्द सहना ही तो इतना आसान नहीं होता, ना कम होता है ना रुकता है, जितना दबाओ उतना ही बढता जाता है.

रवीन्द्र दास 6 मई 2009 को 1:41 pm  

achchhi rachna to hai kintu duniya se samvad bhi aavashyak hai, GARGIJI.

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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