संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ....

कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।
मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥

तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।

नाम मेरा भी शामिल हो, जो चर्चा इश्क का आये।
जो सदियों तक जहाँ माने, मैं ऐसी रीत बन जाऊँ।।

मुझसे देखे नहीं जाते, तेरे झुलसे हुए आँसू।
मेरी फरियाद है मौला, मैं मौसम शीत बन जाऊँ।।

कहाँ जाये खफा होके, 'मशाल' तेरे आँगन से।
कोई ऐसी दवा दे दे, कि बस अतीत बन जाऊँ।।

कवि : दीपक चौरसिया जी की रचना

16 टिप्पणियाँ:

उम्मीद 21 अगस्त 2009 को 11:23 am बजे  

दीपक चौरसिया जी , आप के इस सहयोग के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद .
आशा है भविष्य मैं भी आप का सहयोग और प्रेम इसी प्रकार अभिव्यक्ति को मिलता रहेगा , और आप के कविता रुपी कमल यहाँ खिल कर अपनी सुगंघ बिखेरते रहेंगे.
आप की इतनी सुन्दर रचना के लिए तहेदिल से आप का अभिवादन

Ajay Santolia 21 अगस्त 2009 को 11:53 am बजे  

तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।
मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊ


दिल को छू लेने वाली पंक्ति है
मेरे पास शब्द नहीं है तारीफ़ में आपकी.


"आशियाने में तू मेरे रहे ना रहे ,
तेरी मजार का इक पत्थर ही बन जाऊ"

Vinay 21 अगस्त 2009 को 1:48 pm बजे  

दीपक जी तो बहुत कविता लिखते हैं

Dipak 'Mashal',  21 अगस्त 2009 को 4:08 pm बजे  

आप सभी के प्रोत्साहन के लिए ह्रदय से धन्यवाद्, बस एक प्रार्थना है कि दीपक चौरसिया को चौरसिया कि बजे 'मशाल' पढें क्योंकि मैं अपने देश को जातिवाद में बनता नहीं देख सकता. वो सिर्फ एक मजबूरी ही है कि यदि सरकारी कागजों पर रहना है तो जाती को लेकर चलना पड़ता है.
आभार

निर्मला कपिला 21 अगस्त 2009 को 4:11 pm बजे  

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।
vaah vaah kyaa baat kahee शुभकामनायें

निर्मला कपिला 21 अगस्त 2009 को 4:11 pm बजे  

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।
vaah vaah kyaa baat kahee शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 21 अगस्त 2009 को 9:09 pm बजे  

दीपक चौरसिया जी को इस सुन्दर रचना के लिए बधाईष

mehek 21 अगस्त 2009 को 9:21 pm बजे  

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

लहू-ए-जिस्म का इक-इक, क़तरा तेरा है अब।
सिर्फ इतनी रज़ा दे दे, मैं तुझपे जीत बन जाऊँ।।
waaaaaaaah bahut hi sunder.

Unknown 21 अगस्त 2009 को 9:30 pm बजे  

वाह !

तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।
तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन जाऊँ।।

__________अच्छी रचना..............
बधाई !

alfaz 22 अगस्त 2009 को 9:39 am बजे  

really good one.
congrats for writing such a good recitation

Tulsibhai 22 अगस्त 2009 को 11:17 am बजे  

"alfaz nahi ki kis alfaz me aisi sundar rachana ke liye aapko dhanyawad kahu "

-----eksacchai {AAWAZ}

http://eksacchai.blogspot.com

Dhiraj Agrawal,  22 अगस्त 2009 को 6:49 pm बजे  

bhut dard hai is gazal me.... apni kitni bhawnao ko btaoge isme.. nice gazal

बेनामी,  8 दिसंबर 2009 को 4:38 pm बजे  

dil ko chou lene wali rachna hai,bahot badiya,

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