संसार कल्पब्रृक्ष है इसकी छाया मैं बैठकर हम जो विचार करेंगे ,हमें वेसे ही परिणाम प्राप्त होंगे ! पूरे संसार मैं अगर कोई क्रान्ति की बात हो सकती है तो वह क्रान्ति तलवार से नहीं ,विचार-शक्ति से आएगी ! तलवार से क्रान्ति नहीं आती ,आती भी है तो पल भर की, चिरस्थाई नहीं विचारों के क्रान्ति ही चिरस्थाई हो सकती है !अभिव्यक्ति ही हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है। यह प्रयास है उन्ही विचारो को शब्द देने का .....यदि आप भी कुछ कहना चाहते है तो कह डालिये इस मंच पर आप का स्वागत है….
" जहाँ विराटता की थोड़ी-सी भी झलक हो, जिस बूँद में सागर का थोड़ा-सा स्वाद मिल जाए, जिस जीवन में सम्भावनाओं के फूल खिलते हुए दिखाई दें, समझना वहाँ कोई दिव्यशक्ति साथ में हें ।"
चिट्ठाजगत

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

मैं चाहती हूँ

इन अश्कों को छुपना चाहती हूँ
तेरे याद को दिल से मिटाना चाहती हूँ ।

तुझे देख कर जो मुझे अहसास होता है
मैं उस से अब पीछे छुड़ाना चाहती हूँ ।

तुम्हारी यादों से तुम्हारी बातों से
अब में बहुत दूर जाना चाहती हूँ ।

खयालो की दुनिया से ख्वबो की दुनिया से
अब में बाहर निकालना चाहती हूँ ।

थक गई हूँ इन कांटों भरी राह पे चलते चलते
अब में कुछ दैर आराम करना चाहती हूँ ।

पर कैसे भला दूँ ए दिल_ए_नादान उस को
जिसे मैं इतना चाहती हूँ........

8 टिप्पणियाँ:

P.N. Subramanian 27 मार्च 2009 को 2:15 pm  

निष्ठुत भी और कोमल भी? सुन्दर रचना. आभार.

P.N. Subramanian 27 मार्च 2009 को 2:16 pm  

निष्ठुर भी और कोमल भी? सुन्दर रचना. आभार.

अनिल कान्त : 27 मार्च 2009 को 2:17 pm  

दिल के हालातों को बहुत ही संजीदगी से पेश किया है आपने

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

संजय तिवारी ’संजू’ 27 मार्च 2009 को 2:38 pm  

प्यार को कभी भुलापाना आसान नही सुंदर रचना है

mehek 27 मार्च 2009 को 4:15 pm  

bhawnao ko bakhubi baan kiya hai,bahut hi sunder

Harshad Jangla 27 मार्च 2009 को 4:57 pm  

Nice poem.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

GIRISH CHANDRA SHUKLA 18 अप्रैल 2009 को 11:07 pm  

ye rachna mere dil ko chu gaye...............

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.
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